भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1354

अस्तोषीद्धरिमेकाग्रमनसा सुसमाहितः ।

प्रेमगद्गदया वाचा तन्न्यस्तहृदयेक्षणः ॥७

प्रह्लाद उवाच

ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः

सत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहैः ।

नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रुः

किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातेः ॥८

मन्ये धनाभिजनरूपतपः श्रुतौज-

स्तेजःप्रभावबलपौरुषबुद्धियोगाः३ ।

नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसो

भक्त्या तुतोष भगवान्गजयूथपाय ॥९

तब ब्रह्माजीने अपने पास ही खड़े प्रह्लादको यह कहकर भेजा कि ‘बेटा! तुम्हारे

पितापर ही तो भगवान् कुपित हुए थे। अब तुम्हीं उनके पास जाकर उन्हें शान्त करो’ ।।३।।

भगवान्के परम प्रेमी प्रह्लाद ‘जो आज्ञा’ कहकर और धीरेसे भगवान्के पास जाकर हाथ

जोड़ पृथ्वीपर साष्टांग लोट गये ।।४।। नृसिंहभगवान्ने देखा कि नन्हा-सा बालक मेरे

चरणोंके पास पड़ा हुआ है। उनका हृदय दयासे भर गया। उन्होंने प्रह्लादको उठाकर उनके

सिरपर अपना वह करकमल रख दिया, जो कालसर्पसे भयभीत पुरुषोंको अभयदान

करनेवाला है ।।५।।

भगवान्के करकमलोंका स्पर्श होते ही उनके बचे-खुचे अशुभ संस्कार भी झड़ गये।

तत्काल उन्हें परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार हो गया। उन्होंने बड़े प्रेम और आनन्दमें मग्न होकर

भगवान्के चरणकमलोंको अपने हृदयमें धारण किया। उस समय उनका सारा शरीर पुलकित

हो गया, हृदयमें प्रेमकी धारा प्रवाहित होने लगी और नेत्रोंसे आनन्दाश्रु झरने लगे ।।६।।

प्रह्लादजी भावपूर्ण हृदय और निर्निमेष नयनोंसे भगवान्‌को देख रहे थे। भावसमाधिसे स्वयं

एकाग्र हुए मनके द्वारा उन्होंने भगवान्के गुणोंका चिन्तन करते हुए प्रेमगद्गद वाणीसे स्तुति

की ।।७।।

प्रह्लादजीने कहा—ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि-मुनि और सिद्ध पुरुषोंकी बुद्धि निरन्तर

सत्त्वगुणमें ही स्थित रहती है। फिर भी वे अपनी धारा-प्रवाह स्तुति और अपने विविध गुणोंसे

आपको अबतक भी सन्तुष्ट नहीं कर सके। फिर मैं तो घोर असुर-जातिमें उत्पन्न हुआ हूँ! क्या

आप मुझसे सन्तुष्ट हो सकते हैं? ।।८।। मैं समझता हूँ कि धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या,

ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग—ये सभी गुण परमपुरुष भगवान्को सन्तुष्ट

करनेमें समर्थ नहीं हैं—परन्तु भक्तिसे तो भगवान् गजेन्द्रपर भी सन्तुष्ट हो गये थे ।।९।।

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