भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1368

अथ दशमोऽध्यायः प्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा

नारद उवाच

भक्तियोगस्य तत् सर्वमन्तरायतयार्भकः । मन्यमानो हृषीकेशं स्मयमान उवाच ह ।।१

प्रह्लाद उवाच

मा मां प्रलोभोयोत्पत्त्याऽऽसक्तं कामेषु¹ तैर्वरैः । तत्सङ्गभीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाश्रितः ।।२

भृत्यलक्षणजिज्ञासुर्भक्तं कामेष्वचोदयत् । भवान् संसारबीजेषु हृदयग्रन्थिषु प्रभो ।।३

नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत² करुणात्मनः । यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक् ।।४

आशासानो न वै भृत्यः स्वामिन्याशिष आत्मनः । न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन् यो राति चाशिषः ।।५

अहं त्वकामस्त्वद्भक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रयः । नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव³ ।।६

यदि रासीश⁴ मे कामान् वरांस्त्वं वरदर्षभ । कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम् ।।७

नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीने बालक होनेपर भी यही समझा कि वरदान माँगना प्रेम-भक्तिका विघ्न है; इसलिये कुछ मुसकराते हुए वे भगवान्‌से बोले ।।१।।

प्रह्लादजीने कहा—प्रभो! मैं जन्मसे ही विषय-भोगोंमें आसक्त हूँ, अब मुझे इन वरोंके द्वारा आप लुभाइये नहीं। मैं उन भोगोंके संगसे डरकर, उनके द्वारा होनेवाली तीव्र वेदनाका अनुभव कर उनसे छूटनेकी अभिलाषासे ही आपकी शरणमें आया हूँ ।।२।। भगवन्! मुझमें

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