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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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शंकर, ब्रह्मा आदि भी अपनी सारी बुद्धि लगाकर ‘वे यह हैं’—इस रूपमें उनका वर्णन नहीं कर सके, फिर हम तो कर ही कैसे सकते हैं। हम तो मौन, भक्ति और संयमके द्वारा ही उनकी पूजा करते हैं। कृपया हमारी यह पूजा स्वीकार करके भक्तवत्सल भगवान् हमपर प्रसन्न हों ।।५०।। युधिष्ठिर! यही एकमात्र आराध्यदेव हैं। प्राचीन कालमें बहुत बड़े मायावी मयासुरने जब रुद्रदेवकी कमनीय कीर्तिमें कलंक लगाना चाहा था, तब इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने फिरसे उनके यशकी रक्षा और विस्तार किया था ।।५१।।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! मयदानव किस कार्यमें जगदीश्वर रुद्रदेवका यश नष्ट करना चाहता था और भगवान् श्रीकृष्णने किस प्रकार उनके यशकी रक्षा की? आप कृपा करके बतलाइये ।।५२।।

नारदजीने कहा—एक बार इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे शक्ति प्राप्त करके देवताओंने युद्धमें असुरोंको जीत लिया था। उस समय सब-के-सब असुर मायावियोंके परमगुरु मयदानवकी शरणमें गये ।।५३।।

स निर्माय पुरस्तिस्रो हैमीरौप्यायसीर्विभुः । दुर्लक्ष्यापायसंयोगा दुर्वितर्क्यपरिच्छदाः ।।५४

ताभिस्तेऽसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन् सेश्वरान् नृप । स्मरन्तो नाशयाञ्चक्रुः पूर्ववैरमलक्षिताः ।।५५

ततस्ते सेश्वरा लोका उपासाद्येश्वरं विभो । त्राहि नस्तावकान्देव विनष्टांस्त्रिपुरालयैः ।।५६

अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः । शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत ।।५७

ततोऽग्निवर्णा इषव उत्पेतूः सूर्यमण्डलात् । यथा मयूखसंदोहा नादृश्यन्त पुरो यतः ।।५८

तैः स्पृष्टा व्यसवः सर्वे निपेतुः स्म पुरौकसः । तानानीय महायोगी मयः कूपरसेऽक्षिपत् ।।५९

सिद्धामृतरसस्पृष्टा वज्रसारा महौजसः । उत्तस्थुर्मेघदलना विद्युता इव वह्नयः ।।६०

विलोक्य भग्नसङ्कल्पं विमनस्कं वृषध्वजम् ।

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