श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवन्यैश्चरुपुरोडाशान् निर्वपेत्⁴ कालचोदितान् । लब्धे नवे नवेऽन्नाद्ये पुराणं तु परित्यजेत् ।।१९
अग्न्यर्थमेव शरणमुटजं वाद्रिकन्दराम्⁵ । श्रयेत हिमवात्वग्निवर्षार्कातपषाट्⁶ स्वयं ।।२०
केशरोमनखश्मश्रुमलानि जटिलो दधत् । कमण्डल्वजिने दण्डवल्कलाग्निपरिच्छदान् ।।२१
चरेद् वने द्वादशाब्दानष्टौ वा चतुरो मुनिः । द्वावेकं वा यथा बुद्धिर्न विपद्येत कृच्छ्रतः ।।२२
यदाकल्पः स्वक्रियायां व्याधिभिर्ज्ररयाथवा⁷ । आन्वीक्षिक्यां वा विद्यायां कुर्यादनशनादिकम् ।।२३
अब मैं ऋषियोंके मतानुसार वानप्रस्थ-आश्रमके नियम बतलाता हूँ। इनका आचरण करनेसे वानप्रस्थ-आश्रमीको अनायास ही ऋषियोंके लोक महर्लोककी प्राप्ति हो जाती है ।।१७।।
वानप्रस्थ-आश्रमीको जोती हुई भूमिमें उत्पन्न होनेवाले चावल, गेहूँ आदि अन्न नहीं खाने चाहिये। बिना जोते पैदा हुआ अन्न भी यदि असमयमें पका हो, तो उसे भी न खाना चाहिये। आगसे पकाया हुआ या कच्चा अन्न भी न खाय। केवल सूर्यके तापसे पके हुए कन्द, मूल, फल आदिका ही सेवन करे ।।१८।।
जंगलोंमें अपने-आप पैदा हुए धान्योंसे नित्य-नैमित्तिक चरु और पुरोडाशका हवन करे। जब नये-नये अन्न, फल, फूल आदि मिलने लगें, तब पहलेके इकट्ठे किये हुए अन्नका परित्याग कर दे ।।१९।।
अग्निहोत्रके अग्निकी रक्षाके लिये ही घर, पर्णकुटी अथवा पहाड़ की गुफाका आश्रय ले। स्वयं शीत, वायु, अग्नि, वर्षा और घामका सहन करे ।।२०।।
सिरपर जटा धारण करे और केश, रोम, नख एवं दाढ़ी-मूँछ न कटवाये तथा मैलको भी शरीरसे अलग न करे। कमण्डलु, मृगचर्म, दण्ड, वल्कल-वस्त्र और अग्निहोत्रकी सामग्रियोंको अपने पास रखे ।।२१।।
विचारवान् पुरुषको चाहिये कि बारह, आठ, चार, दो या एक वर्षतक वानप्रस्थ-आश्रमके नियमोंका पालन करे। ध्यान रहे कि कहीं अधिक तपस्याका क्लेश सहन करनेसे बुद्धि बिगड़ न जाय ।।२२।।
वानप्रस्थी पुरुष जब रोग अथवा बुढ़ापेके कारण अपने कर्म पूरे न कर सके और ebook converter DEMO Watermarks*