श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् । वादवादांस्त्यजेत् तर्कान्पक्षं कं२ च न संश्रयेत् ।।७
न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद् बहून् । न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत् क्वचित् ।।८
न यतेराश्रमः प्रायो धर्महेतुर्महात्मनः । शान्तस्य समचित्तस्य बिभृयादुत वा त्यजेत् ।।९
अव्यक्तलिङ्गो व्यक्तार्थो मनीष्युन्मत्तबालवत् । कविर्मूकवदात्मानं स दृष्ट्या दर्शयेन्नृणाम् ।।१०
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च ।।११
तं शयानं धरोपस्थे कावेर्यां सह्यसानुनि । रजस्वैस्तनूदेशैर्निगूढामलतेजसम् ।।१२
ददर्श लोकान्विचरँल्लोकतत्त्वविवित्सया । वृतोऽमात्यैः कतिपयैः प्रह्लादो भगवत्प्रियः ।।१३
इस सम्पूर्ण विश्वको कार्य और कारणसे अतीत परमात्मामें अध्यस्त जाने और कार्य-कारणस्वरूप इस जगत्में ब्रह्मस्वरूप अपने आत्माको परिपूर्ण देखे ।।४।। आत्मदर्शी संन्यासी सुषुप्ति और जागरणकी सन्धिमें अपने स्वरूपका अनुभव करे और बन्धन तथा मोक्ष दोनों ही केवल माया हैं, वस्तुतः कुछ नहीं—ऐसा समझे ।।५।। न तो शरीरकी अवश्य होनेवाली मृत्युका अभिनन्दन करे और न अनिश्चित जीवनका। केवल समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और नाशके कारण कालकी प्रतीक्षा करता रहे ।।६।। असत्य—अनात्मवस्तुका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंसे प्रीति न करे। अपने जीवन-निर्वाहके लिये कोई जीविका न करे, केवल वाद-विवादके लिये कोई तर्क न करे और संसारमें किसीका पक्ष न ले ।।७।। शिष्य-मण्डली न जुटावे, बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे, व्याख्यान न दे और बड़े-बड़े कामोंका आरम्भ न करे ।।८।। शान्त, समदर्शी एवं महात्मा संन्यासीके लिये किसी आश्रमका बन्धन धर्मका कारण नहीं है। वह अपने आश्रमके चिह्नोंको धारण करे, चाहे छोड़ दे ।।९।। उसके पास कोई आश्रमका चिह्न न हो, परन्तु वह आत्मानुसन्धानमें मग्न हो। हो तो अत्यन्त विचारशील, परन्तु जान पड़े पागल और बालककी तरह। वह अत्यन्त प्रतिभाशाली होनेपर भी साधारण मनुष्योंकी दृष्टिसे ऐसा जान पड़े मानो कोई गूँगा है ।।१०।।
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