भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1399

आध्यात्मिकादिभिर्दुःखैर्विमुक्तस्य कर्हिचित् । मर्त्यस्य कृच्छ्रोपनतैरर्थैः कामैः क्रियेत किम् ।।३०

पश्यामि धनिनां क्लेशं लुब्धानाम् अजितात्मनाम् । भयादललब्धनिद्राणां सर्वतोऽभिविशङ्किनाम् ।।३१

राजतश्चोरतः शत्रोः स्वजनात्पशुपक्षितः । अर्थिभ्यः कालतः स्वस्मान्नित्यं प्राणार्थवद्भयम् ।।३२

शोकमोहभयक्रोधरागक्लैब्यश्रमादयः । यन्मूलाः स्युर्नृणां जह्यात् स्पृहां१ प्राणार्थयोर्बुधः ।।३३

मधुकारमहासर्पौ लोकेऽस्मिन्नो गुरूत्तमौ । वैराग्यं परितोषं च प्राप्ता यच्छिक्षया वयम् ।।३४

विरागः सर्वकामेभ्यः शिक्षितो मे मधुव्रतात् । कृच्छ्राप्तं मधुवद् वित्तं हत्वाप्यन्यो हरेत्पतिम् ।।३५

अनीहः परितुष्टात्मा यदृच्छोपनतादहम् । नो चेच्छये बह्वहानि महाहिरिव सत्त्ववान् ।।३६

क्वचिदल्पं क्वचिद् भूरि भुञ्जेऽन्नं स्वाद्वस्वादु वा । क्वचिद् भूरिगुणोपेतं गुणहीनमुत२ क्वचित् ।।३७

श्रद्धयोपाहृतं३ क्वापि कदाचिन्मानवर्जितम् । भुञ्जे भुक्त्वाथ कस्मिंश्चिद् दिवा नक्तं यदृच्छया ।।३८

मनुष्य सर्वदा शारीरिक, मानसिक आदि दुःखोंसे आक्रान्त ही रहता है। मरणशील तो है ही, यदि उसने बड़े श्रम और कष्टसे कुछ धन और भोग प्राप्त कर भी लिया तो क्या लाभ है? ।।३०।। लोभी और इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले धनियोंका दुःख तो मैं देखता ही रहता हूँ। भयके मारे उन्हें नींद नहीं आती। सबपर उनका सन्देह बना रहता है ।।३१।।

जो जीवन और धनके लोभी हैं—वे राजा, चोर, शत्रु, स्वजन, पशु-पक्षी, याचक और कालसे, यहाँतक कि ‘कहीं मैं भूल न कर बैठूँ, अधिक न खर्च कर दूँ’—इस आशंकासे अपने-आप भी सदा डरते रहते हैं ।।३२।। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसके

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