भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

सर्वथाऽऽगमनं कार्यं क्षणोऽत्रैव सुदुर्लभः ॥१० एवमाकारणं तेषां कर्तव्यं विनयेन च । आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ॥११ तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं मतम् । विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत्कथास्थलम् ॥१२ शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् । गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् ॥१३ अर्वाक्पञ्चाहतो यत्नादास्तीर्णानि प्रमेलयेत् । कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीखण्डमण्डितः ॥१४ फलपुष्पदलैर्विश्वग्वितानेन विराजितः । चतुर्दिक्षु ध्वजारोपो बहुसम्पद्विराजितः ॥१५

कथा आरम्भ करनेमें भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण—ये छह महीने श्रोताओंके लिये मोक्षकी प्राप्तिके कारण हैं ॥३॥ देवर्षे! इन महीनोंमें भी भद्रा-व्यतीपात आदि कुयोगोंको सर्वथा त्याग देना चाहिये तथा दूसरे लोग जो उत्साही हों, उन्हें अपना सहायक बना लेना चाहिये ॥४॥ फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरोंमें यह संवाद भेजना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, सब लोगोंको सपरिवार पधारना चाहिये ॥५॥ जो स्त्री और शूद्रादि भगवत्कथा एवं संकीर्तनसे दूर पड़ गये हैं। उनको भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये ॥६॥ देश-देशमें जो विरक्त वैष्णव और हरिकीर्तनके प्रेमी हों, उनके पास निमन्त्रणपत्र अवश्य भेजे। उसे लिखनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है ॥७॥ ‘महानुभावो! यहाँ सात दिनतक सत्पुरुषोंका बड़ा दुर्लभ समागम रहेगा और अपूर्व रसमयी श्रीमद्भागवतकी कथा होगी ॥८॥ आपलोग भगवद्रसके रसिक हैं, अतः श्रीभागवतामृतका पान करनेके लिये प्रेमपूर्वक शीघ्र ही पधारनेकी कृपा करें ॥९॥ यदि आपको विशेष अवकाश न हो, तो भी एक दिनके लिये तो अवश्य ही कृपा करनी चाहिये; क्योंकि यहाँका तो एक क्षण भी अत्यन्त दुर्लभ है’ ॥१०॥ इस प्रकार विनयपूर्वक उन्हें निमन्त्रित करे और जो लोग आयें, उनके लिये यथोचित निवास-स्थानका प्रबन्ध करे ॥११॥

कथाका श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है। जहाँ लम्बा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथास्थल रखना चाहिये ॥१२॥ भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे चौक पूरे। घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे ॥१३॥ पाँच दिन पहलेसे ही यत्नपूर्वक बहुत-से बिछानेके वस्त्र एकत्र कर ले तथा केलेके खंभोंसे सुशोभित एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये ॥१४॥ उसे सब ओर फल, पुष्प, पत्र और चँदोवेसे अलंकृत करे तथा चारों ओर झंडियाँ लगाकर तरह-तरहके सामानोंसे सजा दे ॥१५॥ उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर बैठाये ॥१६॥ आगेकी ओर उनके लिये वहाँ यथोचित आसन

ebook converter DEMO Watermarks*