भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1407

या श्रवण नक्षत्रसे योग—ये सारे समय पितृगणोंका श्राद्ध करने योग्य एवं श्रेष्ठ हैं। ये योग केवल श्राद्धके लिये ही नहीं, सभी पुण्यकर्मोंके लिये उपयोगी हैं। ये कल्याणकी साधनाके उपयुक्त और शुभकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं। इन अवसरोंपर अपनी पूरी शक्ति लगाकर शुभ कर्म करने चाहिये। इसीमें जीवनकी सफलता है ।।२०-२४।। इन शुभ संयोगोंमें जो स्नान, जप, होम, व्रत तथा देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा की जाती है अथवा जो कुछ देवता, पितर, मनुष्य एवं प्राणियोंको समर्पित किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है ।।२५।। युधिष्ठिर! इसी प्रकार स्त्रीके पुंसवन आदि, सन्तानके जातकर्मादि तथा अपने यज्ञ-दीक्षा आदि संस्कारोंके समय, शव-दाहके दिन या वार्षिक श्राद्धके उपलक्ष्यमें अथवा अन्य मांगलिक कर्मोंमें दान आदि शुभकर्म करने चाहिये ।।२६।।

अथ देशान्प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेयआवहान् । स वै पुण्यतमो देशः सत्पात्रं यत्र लभ्यते ॥२७

बिम्बं भगवतो यत्र सर्वमेतच्चराचरम् । यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम् ॥२८

यत्र यत्र हरेरर्चा स देशः श्रेयसां पदम् । यत्र गङ्गादयो नद्यः पुराणेषु च विश्रुताः ॥२९

सरांसि पुष्करादीनि क्षेत्राण्यर्हाश्रितान्युत । कुरुक्षेत्रं गयशिरः प्रयागः पुलहाश्रमः ॥३०

नैमिषं फाल्गुनं सेतुः प्रभासोऽथ कुशस्थली । वाराणसी मधुपुरी पम्पा बिन्दुसरस्तथा ॥३१

नारायणाश्रमो नन्दा सीतारामश्रमादयः । सर्वे कुलाचला राजन्महेन्द्रमलयादयः ॥३२

एते पुण्यतमा देशा हरेरर्चाश्रिताश्च ये । एतान्देशान् निषेवेत श्रेयस्कामो ह्यभीक्ष्णशः । धर्मो ह्यत्रेहितः पुंसां सहस्राधिकफलोदयः ॥३३

पात्रं त्वत्र निरुक्तं वै कविभिः पात्रवित्तमैः । हरिरेवैक उर्वीश यन्मयं वै चराचरम् ॥३४