भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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एतदिष्टं प्रवृत्ताख्यं हुतं प्रहुतमेव च । पूर्तं सुरालयारामकूपाजीव्यादिलक्षणम् ॥४९

द्रव्यसूक्ष्मविपाकश्च धूमो रात्रिरपक्षयः । अयनं दक्षिणं सोमो दर्श ओषधिवीरुधः ॥५०

अन्नं रेत इति क्ष्मेश पितृयानं पुनर्भवः । एकैकश्येनानुपूर्वं भूत्वा भूत्वेह जायते ॥५१

वैदिक कर्म दो प्रकारके हैं—एक तो वे जो वृत्तियोंको उनके विषयोंकी ओर ले जाते हैं—प्रवृत्तिपरक और दूसरे वे जो वृत्तियोंको उनके विषयोंकी ओरसे लौटाकर शान्त एवं आत्म-साक्षात्कारके योग्य बना देते हैं—निवृत्तिपरक। प्रवृत्तिपरक कर्ममार्गसे बार-बार जन्म-मृत्युकी प्राप्ति होती है और निवृत्तिपरक भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्गके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति होती है ॥४७॥ श्येनयागादि हिंसामय कर्म, अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुयाग, सोमयाग, वैश्वदेव, बलिहरण आदि द्रव्यमय कर्म ‘इष्ट’ कहलाते हैं और देवालय, बगीचा, कुआँ आदि बनवाना तथा प्याऊ आदि लगाना ‘पूर्तकर्म’ हैं। ये सभी प्रवृत्तिपरक कर्म हैं और सकामभावसे युक्त होनेपर अशान्तिके ही कारण बनते हैं ॥४८-४९॥ प्रवृत्तिपरायण पुरुष मरनेपर चरु-पुरोडाशादि यज्ञ-सम्बन्धी द्रव्योंके सूक्ष्मभागसे बना हुआ शरीर धारणकर धूमाभिमानी देवताओंके पास जाता है। फिर क्रमशः रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके अभिमानी देवताओंके पास जाकर चन्द्रलोकमें पहुँचता है। वहाँसे भोग समाप्त होनेपर अमावस्याके चन्द्रमाके समान क्षीण होकर वृष्टिद्वारा क्रमशः ओषधि, लता, अन्न और वीर्यके रूपमें परिणत होकर पितृयान-मार्गसे पुनः संसारमें ही जन्म लेता है ॥५०-५१॥

निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृतो द्विजः । इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान् ज्ञानदीपेषु जुह्वति ॥५२

इन्द्रियाणि मनस्यूर्मौ वाचि वैकारिकं मनः । वाचं वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् । ओङ्कारं बिन्दौ नादे तं तं तु प्राणे महत्यमुम् ॥५३

अग्निः सूर्यो दिवा प्राह्नः शुक्लो राकोत्तरं स्वराट् । विश्वश्च१ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयात् ॥५४

देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वानुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥५५ **ebook converter DEMO Watermarks***