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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1428

नॄन् शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितं

प्रभुं प्रपद्येऽखिलधर्मभावनम् ।।१६

श्रीशुक उवाच

इति मन्त्रोपनिषदं व्याहरन्तं समाहितम् ।

दृष्ट्वासुरा यातुधाना जग्धुमभ्यद्रवन् क्षुधा ।।१७

तांस्तथावसितान् वीक्ष्य यज्ञः सर्वगतो हरिः ।

यामैः परिवृतो देवैर्हत्वाशासत् त्रिविष्टपम् ।।१८

वही परमात्मा विश्वरूप हैं। उनके अनन्त नाम हैं। वे सर्वशक्तिमान् सत्य, स्वयंप्रकाश,

अजन्मा और पुराणपुरुष हैं। वे अपनी मायाशक्तिके द्वारा ही विश्वसृष्टिके जन्म आदिको

स्वीकार कर लेते हैं और अपनी विद्याशक्तिके द्वारा उसका त्याग करके निष्क्रिय,

सत्स्वरूपमात्र रहते हैं ।।१३।।

इसीसे ऋषि-मुनि नैष्कर्म्यस्थिति अर्थात् ब्रह्मसे एकत्व प्राप्त करनेके लिये पहले

कर्मयोगका अनुष्ठान करते हैं। प्रायः कर्म करनेवाला पुरुष ही अन्तमें निष्क्रिय होकर कर्मोंसे

छुट्टी पा लेता है ।।१४।।

यों तो सर्वशक्तिमान् भगवान् भी कर्म करते हैं, परन्तु वे आत्मलाभसे पूर्णकाम होनेके

कारण उन कर्मोंमें आसक्त नहीं होते। अतः उन्हींका अनुसरण करके अनासक्त रहकर कर्म

करनेवाले भी कर्मबन्धनसे मुक्त ही रहते हैं ।।१५।।

भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये उनमें अहंकारका लेश भी नहीं है। वे सर्वतः परिपूर्ण हैं,

इसलिये उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है। वे बिना किसीकी प्रेरणाके स्वच्छन्दरूपसे ही

कर्म करते हैं। वे अपनी ही बनायी हुई मर्यादामें स्थित रहकर अपने कर्मोंके द्वारा मनुष्योंको

शिक्षा देते हैं। वे ही समस्त धर्मोंके प्रवर्तक और उनके जीवनदाता हैं। मैं उन्हीं प्रभुकी शरणमें

हूँ ।।१६।।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक बार स्वायम्भुव मनु एकाग्रचित्तसे इस मन्त्रमय

उपनिषत्-स्वरूप श्रुतिका पाठ कर रहे थे। उन्हें नींदमें अचेत होकर बड़बड़ाते जान भूखे

असुर और राक्षस खा डालनेके लिये उनपर टूट पड़े ।।१७।।

यह देखकर अन्तर्यामी भगवान् यज्ञपुरुष अपने पुत्र याम नामक देवताओंके साथ वहाँ

आये। उन्होंने उन खा डालनेके निश्चयसे आये हुए असुरोंका संहार कर डाला और फिर वे

इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित होकर स्वर्गका शासन करने लगे ।।१८।।

स्वारोचिषो द्वितीयस्तु मनुरग्नेः सुतोऽभवत् ।

द्युमत्सुषेणरोचिष्मत्प्रमुखास्तस्य चात्मजाः ।।१९

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