श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयस्यावतारांशकलाविसर्जिता
व्रजाम सर्वे शरणं तमव्ययम् ।।२१
न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो
नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।
अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं
धत्ते रजःसत्त्वतमांसि काले ।।२२
अयं च तस्य स्थितिपालनक्षणः
सत्त्वं जुषाणस्य भवाय देहिनाम् ।
तस्माद् व्रजामः शरणं जगद्गुरुं
स्वानां स नो धास्यति शं सुरप्रियः ।।२३
दुर्वासाके शापसे* तीनों लोक और स्वयं इन्द्र भी श्रीहीन हो गये थे। यहाँतक कि यज्ञ-
यागादि धर्म-कर्मोंका भी लोप हो गया था ।।१६।। यह सब दुर्दशा देखकर इन्द्र, वरुण आदि
देवताओंने आपसमें बहुत कुछ सोचा-विचारा; परन्तु अपने विचारोंसे वे किसी निश्चयपर नहीं
पहुँच सके ।।१७।। तब वे सब-के-सब सुमेरुके शिखरपर स्थित ब्रह्माजीकी सभामें गये और
वहाँ उन लोगोंने बड़ी नम्रतासे ब्रह्माजीकी सेवामें अपनी परिस्थितिका विस्तृत विवरण
उपस्थित किया ।।१८।। ब्रह्माजीने स्वयं देखा कि इन्द्र, वायु आदि देवता श्रीहीन एवं
शक्तिहीन हो गये हैं। लोगोंकी परिस्थिति बड़ी विकट, संकटग्रस्त हो गयी है और असुर इसके
विपरीत फल-फूल रहे हैं ।।१९।।
समर्थ ब्रह्माजीने अपना मन एकाग्र करके परम पुरुष भगवान्का स्मरण किया; फिर
थोड़ी देर रुककर प्रफुल्लित मुखसे देवताओंको सम्बोधित करते हुए कहा ।।२०।।
'देवताओ! मैं, शंकरजी, तुमलोग तथा असुर, दैत्य, मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष और स्वेदज आदि
समस्त प्राणी जिनके विराट् रूपके एक अत्यन्त स्वल्पातिस्वल्प अंशसे रचे गये हैं—हमलोग
उन अविनाशी प्रभुकी ही शरण ग्रहण करें ।।२१।।
यद्यपि उनकी दृष्टिमें न कोई वधका पात्र है और न रक्षाका, उनके लिये न तो कोई
उपेक्षणीय है न कोई आदरका पात्र ही—फिर भी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके लिये समय-
समयपर वे रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणको स्वीकार किया करते हैं ।।२२।। उन्होंने इस
समय प्राणियोंके कल्याणके लिये सत्त्वगुणको स्वीकार कर रखा है। इसलिये यह जगत्की
स्थिति और रक्षाका अवसर है। अतः हम सब उन्हीं जगद्गुरु परमात्माकी शरण ग्रहण करते
हैं। वे देवताओंके प्रिय हैं और देवता उनके प्रिय। इसलिये हम निजजनोंका वे अवश्य ही
कल्याण करेंगे ।।२३।।
श्रीशुक उवाच
इत्याभाष्य सुरान्वेधाः सह देवैररिन्दम ।
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