भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1461

जो पाँचों प्राण (प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान), दसों इन्द्रिय, मन, पाँचों असु (नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय) एवं शरीरका आश्रय है—वे परम ऐश्वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्न हों ।।३८।। जिनके बलसे इन्द्र, प्रसन्नतासे समस्त देवगण, क्रोधसे शङ्कर, बुद्धिसे ब्रह्मा, इन्द्रियोंसे वेद और ऋषि तथा लिंगसे प्रजापति उत्पन्न हुए हैं—वे परम ऐश्वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्न हों ।।३९।। जिनके वक्षःस्थलसे लक्ष्मी, छायासे पितृगण, स्तनसे धर्म, पीठसे अधर्म, सिरसे आकाश और विहारसे अप्सराएँ प्रकट हुई हैं, वे परम ऐश्वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्न हों ।।४०।।

विप्रो मुखं^१ ब्रह्म च यस्य गुह्यं राजन्य आसीद् भुजयोर्बलं^२ च । ऊर्वोर्विडोजोऽङ्घ्रिरवेदशूद्रो^३ प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ।।४१

लोभोऽधरात् प्रीतिरुपर्यभूद् द्युति- र्नस्तः पशव्यः स्पर्शन कामः । भ्रुवोर्यमः पक्ष्मभवस्तु कालः प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ।।४२

द्रव्यं वयः कर्म गुणान्विशेषं यद्योगमायाविहितान्वदन्ति । यद् दुर्विभाव्यं प्रबुधापबाधं प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ।।४३

नमोऽस्तु तस्मा उपशान्तशक्तये स्वाराज्यलाभप्रतिपूरितात्मने । गुणेषु मायारचितेषु वृत्तिभि- र्न सज्जमानाय नभस्वदूतये ।।४४

स त्वं नो दर्शयात्मानमस्मत्करणगोचरम् । प्रपन्नानां दिदृक्षूणां सस्मितं ते मुखाम्बुजम् ।।४५

तैस्तैः स्वेच्छाधृतै रूपैः काले काले स्वयं विभो । कर्म दुर्विषहं यन्नो भगवांस्तत् करोति हि ।।४६

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