श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1464, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठोऽध्यायः देवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना
श्रीशुक उवाच
एवं स्तुतः सुरगणैर्भगवान् हरिरीश्वरः । तेषामाविरभूद् राजन्सहस्रार्कोदयद्युतिः ॥१
तेनैव महसा सर्वे देवाः प्रतिहतेक्षणाः । नापश्यन्खं दिशः क्षोणिमात्मानं च कुतो विभुम् ॥२
विरिञ्चो भगवान् दृष्ट्वा सह शर्वेण तां तनुम् । स्वच्छां मरकतश्यामां कञ्जगर्भारुणेक्षणाम् ॥३
तप्तहेमावदातेन लसत्कौशेयवाससा । प्रसन्नचारुसर्वाङ्गीं सुमुखीं सुन्दरभ्रुवम् ॥४
महामणिकिरीटेन केयूराभ्यां च भूषिताम् । कर्णाभरणनिर्भातकपोलश्रीमुखाम्बुजाम् ॥५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनके बीचमें ही प्रकट हो गये। उनके शरीरकी प्रभा ऐसी थी, मानो हजारों सूर्य एक साथ ही उग गये हों ॥१॥ भगवान्की उस प्रभासे सभी देवताओंकी आँखें चौंधिया गयीं। वे भगवान्को तो क्या—आकाश, दिशाएँ, पृथ्वी और अपने शरीरको भी न देख सके ॥२॥ केवल भगवान् शंकर और ब्रह्माजीने उस छबिका दर्शन किया। बड़ी ही सुन्दर झाँकी थी। मरकतमणि (पन्ने)-के समान स्वच्छ श्यामल शरीर, कमलके भीतरी भागके समान सुकुमार नेत्रोंमें लाल-लाल डोरियाँ और चमकते हुए सुनहले रंगका रेशमी पीताम्बर! सर्वांगसुन्दर शरीरके रोम-रोमसे प्रसन्नता फूटी पड़ती थी। धनुषके समान टेढ़ी भौंहें और बड़ा ही सुन्दर मुख। सिरपर महामणिमय किरीट और भुजाओंमें बाजूबंद। कानोंके झलकते हुए कुण्डलोंकी चमक पड़नेसे कपोल और भी सुन्दर हो उठते थे,जिससे मुखकमल खिल उठता था। कमरमें करधनीकी लड़ियाँ, हाथोंमें कंगन, गलेमें हार और चरणोंमें नूपुर शोभायमान थे। वक्षःस्थलपर लक्ष्मी और गलेमें कौस्तुभमणि तथा वनमाला सुशोभित थीं ॥३-६॥
काञ्चीकलापवलयहारनूपुरशोभिताम् ।
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