भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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है, सूर्य नेत्र हैं और जल वीर्य है। आपका अहंकार नीचे-ऊँचे सभी जीवोंका आश्रय है। चन्द्रमा मन है और प्रभो! स्वर्ग आपका सिर है ।।२७।। वेदस्वरूप भगवन्! समुद्र आपकी कोख हैं। पर्वत हड्डियाँ हैं। सब प्रकारकी ओषधियाँ और घास आपके रोम हैं। गायत्री आदि छन्द आपकी सातों धातुएँ हैं और सभी प्रकारके धर्म आपके हृदय हैं ।।२८।।

मुखानि पंचोपनिषदस्तवेश यैस्त्रिंशदष्टोत्तरमन्त्रवर्गः । यत् तच्छिवाख्यं परमार्थतत्त्वं१ देव स्वयंज्योतिरवस्थितिस्ते ।।२९

छाया त्वधर्मोर्मिषु यैर्विसर्गो नेत्रत्रयं सत्त्वरजस्तमांसि । सांख्यात्मनः२ शास्त्रकृतस्तवेक्षा छन्दोमयो देव ऋषिः पुराणः ।।३०

न ते गिरित्राखिललोकपाल- विरिञ्चवैकुण्ठसुरेन्द्रगम्यम् । ज्योतिः परं यत्र रजस्तमश्च सत्त्वं न यद् ब्रह्म निरस्तभेदम् ।।३१

कामाध्वरत्रिपुरकालगराद्यनेक- भूतद्रुहः क्षपयतः स्तुतये न३ तत् ते । यस्त्वन्तकाल इदमात्मकृतं स्वनेत्र- वह्निस्फुलिङ्गशिखया भसितं न वेद ।।३२

ये त्वात्मारामगुरुभिर्हृदि चिन्तिताङ्घ्रि- द्वन्द्वं चरन्तमुमया तपसाभितप्तम् । कत्थन्त४ उग्रपरुषं निरतं श्मशाने ते नूनमूर्तिमविदंस्तव५ हातलज्जाः ।।३३

स्वामिन्! सद्योजातादि पाँच उपनिषद् ही आपके तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव और ईशान नामक पाँच मुख हैं। उन्हींके पदच्छेदसे अड़तीस कलात्मक मन्त्र निकले हैं। आप जब समस्त प्रपंचसे उपरत होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं, तब उसी स्थितिका नाम होता है ‘शिव’। वास्तवमें वही स्वयंप्रकाश परमार्थतत्त्व है ।।२९।। अधर्मकी दम्भ-लोभ आदि

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