भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पिबत भागवतं रसमालयं

मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।८०

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो

निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं

तापत्रयोन्मूलनम् ।

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते

किं वा परैरीश्वरः

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः

शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।।८१

श्रीमद्भागवतं पुराणतिलकं

यद्वैष्णवानां धनं

यस्मिन् पारमहंस्यमेवममलं

ज्ञानं परं गीयते ।

यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं

नैष्कर्म्यमाविष्कृतं

तच्छृण्वन् प्रपठन् विचारणपरो

भक्त्या विमुच्येन्नरः ।।८२

स्वर्गे सत्ये च कैलासे वैकुण्ठे नास्त्ययं रसः ।

अतः पिबन्तु सद्भाग्या मा मा मुञ्चत कर्हिचित् ।।८३

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! वैष्णवश्रेष्ठ नारदजी यों कह ही रहे थे कि वहाँ घूमते-

फिरते योगेश्वर शुकदेवजी आ गये ।।७७।। कथा समाप्त होते ही व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजी

वहाँ पधारे। सोलह वर्षकी-सी आयु, आत्मलाभसे पूर्ण, ज्ञानरूपी महासागरका संवर्धन

करनेके लिये चन्द्रमाके समान वे प्रेमसे धीरे-धीरे श्रीमद्भागवतका पाठ कर रहे थे ।।७८।।

परम तेजस्वी शुकदेवजीको देखकर सारे सभासद् झटपट खड़े हो गये और उन्हें एक ऊँचे

आसनपर बैठाया। फिर देवर्षि नारदजीने उनका प्रेमपूर्वक पूजन किया। उन्होंने सुखपूर्वक

बैठकर कहा—'आपलोग मेरी निर्मल वाणी सुनिये' ।।७९।।

श्रीशुकदेवजी बोले—रसिक एवं भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका

परिपक्व फल है। श्रीशुकदेवरूप शुकके मुखका संयोग होनेसे अमृतरससे परिपूर्ण है। यह

रस-ही-रस है—इसमें न छिलका है न गुठली। यह इसी लोकमें सुलभ है। जबतक शरीरमें

चेतना रहे तबतक आपलोग बार-बार इसका पान करें ।।८०।। महामुनि व्यासदेवने

श्रीमद्भागवतमहापुराणकी रचना की है। इसमें निष्कपट—निष्काम परम धर्मका निरूपण है।

इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषोंके जानने-योग्य कल्याणकारी वास्तविक वस्तुका वर्णन है,

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