श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवयं कश्यपदाय़ादा भ्रातरः कृतपौरुषाः । विभजस्व यथान्यायं नैव भेदो यथा भवेत् ॥७
इत्युपामन्त्रितो दैत्यैर्मायायोषिद्वपुर्हरिः । प्रहस्य रुचिरापाङ्गैर्निरीक्षन्निदमब्रवीत् ॥८
श्रीभगवानुवाच
कथं कश्यपदाय़ादाः पुंश्चल्यां मयि सङ्गताः । विश्वासं पण्डितो जातु कामिनीषु न याति हि ॥९
सालावृकाणां स्त्रीणां च स्वैरिणीनां सुरद्विषः । सख्यान्याहुरनित्यानि नूतनं नूतनं विचिन्वताम् ॥१०
श्रीशुक उवाच
इति ते क्वेलिसैस्तस्या आश्वस्तमनसोऽसुराः । जहसुर्भावगम्भीरं ददुश्चामृतभाजनम् ॥११
ततो गृहीत्वामृतभाजनं हरि- र्बभाष ईषत्स्मितशोभया गिरा । यद्यभ्युपेतं क्व च साध्वसाधु वा कृतं मया वो विभजे सुधामिमाम् ॥१२
इत्याभिव्याहृतं तस्या आकर्ण्यासुरपुङ्गवाः । अप्रमाणविदस्तस्यास्तत् तथेत्यन्वमंसत ॥१३
सुन्दरी! अवश्य ही विधाताने दया करके शरीरधारियोंकी सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं मनको तृप्त करनेके लिये तुम्हें यहाँ भेजा है ॥५॥ मानिनी! वैसे हमलोग एक ही जातिके हैं। फिर भी हम सब एक ही वस्तु चाह रहे हैं, इसलिये हममें डाह और वैरकी गाँठ पड़ गयी है। सुन्दरी! तुम हमारा झगड़ा मिटा दो ॥६॥ हम सभी कश्यपजीके पुत्र होनेके नाते सगे भाई हैं। हमलोगोंने अमृतके लिये बड़ा पुरुषार्थ किया है। तुम न्यायके अनुसार निष्पक्षभावसे इसे बाँट दो, जिससे फिर हमलोगोंमें किसी प्रकारका झगड़ा न हो' ॥७॥ असुरोंने जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब लीलासे स्त्रीवेष धारण करनेवाले भगवान्ने तनिक हँसकर और तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥८॥
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