श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1509, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथैकादशोऽध्यायः देवासुर-संग्रामकी समाप्ति
श्रीशुक उवाच
अथो सुराः प्रत्युपलब्धचेतसः परस्य पुंसः परयानुकम्पया । जघ्नुर्भृशं शक्रसमीरणादय- स्तांस्तान्रणे यैरभिसंहताः पुरा ॥१॥ वैरोचनाय संरब्धो भगवान्पाकशासनः । उदयच्छद् यदा वज्रं प्रजा हाहेति चुक्रुशुः ॥२॥ वज्रपाणिस्तमाहेदं तिरस्कृत्य पुरःस्थितम् । मनस्विनं सुसम्पन्नं विचरन्तं महामृधे ॥३॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! परम पुरुष भगवान्की अहैतुकी कृपासे देवताओंकी घबराहट जाती रही, उनमें नवीन उत्साहका संचार हो गया। पहले इन्द्र, वायु आदि देवगण रणभूमिमें जिन-जिन दैत्योंसे आहत हुए थे, उन्हींके ऊपर अब वे पूरी शक्तिसे प्रहार करने लगे ॥१॥ परम ऐश्वर्यशाली इन्द्रने बलिसे लड़ते-लड़ते जब उनपर क्रोध करके वज्र उठाया तब सारी प्रजामें हाहाकार मच गया ॥२॥ बलि अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर बड़े उत्साहसे युद्धभूमिमें बड़ी निर्भयतासे डटकर विचर रहे थे। उनको अपने सामने ही देखकर हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्रने उनका तिरस्कार करके कहा— ॥३॥
नटवन्मूढ मायाभिर्मायेशान् नो जिगीषसि । जित्वा बालान् निबद्धाक्षान् नटो हरति तद्धनम् ॥४॥
आरुरुक्षन्ति मायाभिरुत्सिसृप्सन्ति ये दिवम् । तान्दस्यून्विधुनोम्यज्ञान्पूर्वस्माच्च पदादधः ॥५॥
सोऽहं दुर्मायिनस्तेऽद्य वज्रेण शतपर्वणा । शिरो हरिष्ये मन्दात्मन्घटस्व ज्ञातिभिः सह ॥६॥
बलिरुवाच
सङ्ग्रामे वर्तमानानां कालचोदितकर्मणाम् ।
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