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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1529

संज्ञा छाया च राजेन्द्र ये प्रागभिहिते तव ॥८

तृतीयां वडवामेके तासां संज्ञासुतास्त्रयः । यमो यमी श्राद्धदेवश्छायायाश्च सुताञ्छृणु ॥९

सावर्णिस्तपती कन्या भार्या संवरणस्य या । शनैश्चरस्तृतीयोऽभूदश्विनौ वडवात्मजौ ॥१०

अष्टमेऽन्तर आयाते सावर्णिर्भविता मनुः । निर्मोकविरजस्काद्याः१ सावर्णितनया नृप२ ॥११

तत्र देवाः सुतपसो विरजा अमृतप्रभाः । तेषां विरोचनसुतो बलिरिन्द्रो भविष्यति ॥१२

दत्त्वेमां याचमानाय विष्णवे यः पदत्रयम् । राद्धमिन्द्रपदं हित्वा ततः सिद्धिमवाप्स्यति ॥१३

योऽसौ भगवता बद्धः प्रीतेन सुतले पुनः । निवेशितोऽधिके स्वर्गादधुनाऽऽस्ते स्वराडिव ॥१४

गालवो दीप्तिमान् रामो द्रोणपुत्रः कृपस्तथा । ऋष्यशृङ्गः पितास्माकं भगवान्बादरायणः ॥१५

इमे सप्तर्षयस्तत्र३ भविष्यन्ति स्वयोगतः । इदानीमासते राजन् स्वे स्व आश्रममण्डले ॥१६

परीक्षित्! इस प्रकार मैंने संक्षेपसे तुम्हें सात मन्वन्तरोंका वर्णन सुनाया; अब भगवान्‌की शक्तिसे युक्त अगले (आनेवाले) सात मन्वन्तरोंका वर्णन करता हूँ ॥७॥

परीक्षित्! यह तो मैं तुम्हें पहले (छठे स्कन्धमें) बता चुका हूँ कि विवस्वान् (भगवान् सूर्य)-की दो पत्नियाँ थीं—संज्ञा और छाया। ये दोनों ही विश्वकर्माकी पुत्री थीं ॥८॥ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि उनकी एक तीसरी पत्नी बडवा भी थी। (मेरे विचारसे तो संज्ञाका ही नाम बडवा हो गया था।) उन सूर्यपत्नियोंमें संज्ञासे तीन सन्तानें हुईं—यम, यमी और श्राद्धदेव। छायाके भी तीन सन्तानें हुईं—सावर्णि, शनैश्चर और तपती नामकी कन्या जो संवरणकी पत्नी हुई। जब संज्ञाने वडवाका रूप धारण कर लिया, तब उससे दोनों अश्विनीकुमार हुए ॥९-१०॥

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