श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1539, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंभ्राजन्ते रूपवन्नार्यो ह्यर्चिर्भिरिव वह्नयः ।।१७
सुरस्त्रीकेशविभ्रष्टनवसौगन्धिकस्रजाम् । यत्रामोदमुपादाय मार्ग आवाति मारुतः ।।१८
हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना । पाण्डुरेण प्रतिच्छन्नमार्गे यान्ति सुरप्रियाः ।।१९
मुक्तावितानैर्मणिहेमकेतुभि- र्नानापताकावलभीभिरावृताम् । शिखण्डिपारावतभृङ्गनादितां वैमानिकस्त्रीकलगीतमङ्गलाम् ।।२०
मृदङ्गशङ्खानकदुन्दुभिस्वनैः सतालवीणामुरजार्ष्टिवेणुभिः । नृत्यैः सवाद्यैरुपदेवगीतकै- र्मनोरमां स्वप्रभया जितप्रभाम् ।।२१
यां न व्रजन्त्यधर्मिष्ठाः खला भूतद्रुहः शठाः । मानिनः कामिनो लुब्धा एभिर्हीना व्रजन्ति यत् ।।२२
तां देवधानीं स वरूथिनीपति- र्बहिः समन्ताद् रुरुधे पृतन्यया । आचार्यदत्तं जलजं महास्वनं दध्मौ प्रयुञ्जन्भयमिन्द्रयोषिताम् ।।२३
मघवांस्तमभिप्रेत्य बलेः परममुद्यमम् । सर्वदेवगणोपेतो गुरुमेतदुवाच ह ।।२४
सभाके स्थान, खेलके चबूतरे और रथ चलनेके बड़े-बड़े मार्गोंसे वह शोभायमान है। दस करोड़ विमान उसमें सर्वदा विद्यमान रहते हैं और मणियोंके बड़े-बड़े चौराहे एवं हीरे और मूँगेकी वेदियाँ बनी हुई हैं ।।१६।। वहाँकी स्त्रियाँ सर्वदा सोलह वर्षकी-सी रहती हैं, उनका यौवन और सौन्दर्य स्थिर रहता है। वे निर्मल वस्त्र पहनकर अपने रूपकी छटासे इस प्रकार देदीप्यमान होती हैं, जैसे अपनी ज्वालाओंसे अग्नि ।।१७।।
देवांगनाओंके जूड़ेसे गिरे हुए नवीन सौगन्धित पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर वहाँके मार्गोंमें
******ebook converter DEMO Watermarks*******