भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1549

अर्चित्वा गन्धमाल्याद्यैः पयसा स्नपयेद् विभुम् । वस्त्रोपवीताभरणापाद्योपस्पर्शनैस्ततः । गन्धधूपादिभिश्चार्चेद् द्वादशाक्षरविद्यया ।।३९ शृतं पयसि नैवेद्यं शाल्यन्नं विभवे सति । ससर्पिः सगुडं दत्त्वा जुहुयान्मूलविद्यया ।।४० निवेदितं तद् भक्ताय दद्याद् भुञ्जीत वा स्वयम् । दत्त्वाऽऽचमनमर्चित्वा ताम्बूलं च निवेदयेत् ।।४१ जपेदष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभिः प्रभुम् । कृत्वा प्रदक्षिणं भूमौ प्रणमेद् दण्डवन्मुदा ।।४२ कृत्वा शिरसि तच्छेषां देवमुद्वासयेत् ततः । द्वयवरान्भोजयेद् विप्रान्पायसेन यथोचितम् ।।४३

आप ही सबके प्राण और आप ही इस जगत्के स्वरूप भी हैं। आप योगके कारण तो हैं ही स्वयं योग और उससे मिलनेवाला ऐश्वर्य भी आप ही हैं। हे हिरण्यगर्भ! आपके लिये मेरे नमस्कार ।।३३।। आप ही आदिदेव हैं। सबके साक्षी हैं। आप ही नरनारायण ऋषिके रूपमें प्रकट स्वयं भगवान् हैं। आपको मेरा नमस्कार ।।३४।। आपका शरीर मरकतमणिके समान साँवला है। समस्त सम्पत्ति और सौन्दर्यकी देवी लक्ष्मी आपकी सेविका हैं। पीताम्बरधारी केशव! आपको मेरा बार-बार नमस्कार ।।३५।। आप सब प्रकारके वर देनेवाले हैं। वर देनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं। तथा जीवोंके एकमात्र वरणीय हैं। यही कारण है कि धीर विवेकी पुरुष अपने कल्याणके लिये आपके चरणोंकी रजकी उपासना करते हैं ।।३६।। जिनके चरणकमलोंकी सुगन्ध प्राप्त करनेकी लालसासे समस्त देवता और स्वयं लक्ष्मीजी भी सेवामें लगी रहती हैं, वे भगवान् मुझपर प्रसन्न हों' ।।३७।।

प्रिये! भगवान् हृषीकेशका आवाहन पहले ही कर ले। फिर इन मन्त्रोंके द्वारा पाद्य, आचमन आदिके साथ श्रद्धापूर्वक मन लगाकर पूजा करे ।।३८।। गन्ध, माला आदिसे पूजा करके भगवान्‌को दूधसे स्नान करावे। उसके बाद वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, पाद्य, आचमन, गन्ध, धूप आदिके द्वारा द्वादशाक्षर मन्त्रसे भगवान्‌की पूजा करे ।।३९।। यदि सामर्थ्य हो तो दूधमें पकाये हुए तथा घी और गुड़ मिले हुए शालिके चावलका नैवेद्य लगावे और उसीका द्वादशाक्षर मन्त्रसे हवन करे ।।४०।। उस नैवेद्यको भगवान्‌के भक्तोंमें बाँट दे या स्वयं पा ले। आचमन और पूजाके बाद ताम्बूल निवेदन करे ।।४१।। एक सौ आठ बार द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करे और स्तुतियोंके द्वारा भगवान्‌का स्तवन करे। प्रदक्षिणा करके बड़े प्रेम और आनन्दसे भूमिपर लोटकर दण्डवत्-प्रणाम करे ।।४२।। निर्माल्यको सिरसे लगाकर देवताका विसर्जन करे। कम-से-कम दो ब्राह्मणोंको यथोचित रीतिसे खीरका भोजन करावे ।।४३।।

भुञ्जीत तैरनुज्ञातः शेषं सेष्टः सभाजितैः । ******ebook converter DEMO Watermarks*******