भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओंको मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियोंको अपनी आँखों देख सको ।।१४।। अदिति! तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र धन और शक्तिसे समृद्ध हो जायें, उनकी कीर्ति और ऐश्वर्य उन्हें फिरसे प्राप्त हो जायँ तथा वे स्वर्गपर अधिकार जमाकर पूर्ववत् विहार करें ।।१५।। परन्तु देवि! वे असुरसेनापति इस समय जीते नहीं जा सकते, ऐसा मेरा निश्चय है; क्योंकि ईश्वर और ब्राह्मण इस समय उनके अनुकूल हैं। इस समय उनके साथ यदि लड़ाई छेड़ी जायगी, तो उससे सुख मिलनेकी आशा नहीं है ।।१६।। अथाप्युपायो मम देवि चिन्त्यः सन्तोषतस्य व्रतचर्यया ते । ममार्चनं नार्हति गन्तुमन्यथा श्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ।।१७ त्वयार्चितश्चाहमपत्यगुप्तये पयोव्रतेनानुगुणं समीडितः । स्वांशेन पुत्रत्वमुपेत्य ते सुतान् गोप्तास्मि मारीचतपस्यधिष्ठितः ।।१८

उपधाव पतिं भद्रे प्रजापतिमकल्मषम् । मां च भावयती पत्यावेवंरूपमवस्थितम् ।।१९ नैतत् परस्मा आख्येयं पृष्ट्यापि कथञ्चन । सर्वं सम्पद्यते देवि देवगुह्यं सुसंवृतम् ।।२०

श्रीशुक उवाच

एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत । अदितिर्दुर्लभं लब्ध्वा हरेर्जन्मात्मनि प्रभोः ।।२१ उपाधावत् पतिं भक्त्या परया कृतकृत्यवत् । स वै समाधियोगेन कश्यपस्तदबुध्यत ।।२२ प्रविष्टमात्मनि हरेरंशं ह्यवितथेक्षणः । सोऽदित्यां वीर्यमाधत्त तपसा चिरसंभृतम् । समाहितमना राजन्दारुण्यग्निं यथानिलः ।।२३ अदितेर्धिष्ठितं गर्भं भगवन्तं सनातनम् । हिरण्यगर्भो विज्ञाय समीडे गुह्यनामभिः ।।२४

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