भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियोंके साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामनभगवान्‌का स्वागत-सत्कार किया ।।२४-२५।। भगवान्‌के लघुरूपके अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलिको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामनभगवान्‌को एक उत्तम आसन दिया ।।२६।।

फिर स्वागत-वाणीसे उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और संगरहित महापुरुषोंको भी अत्यन्त मनोहर लगनेवाले वामनभगवान्‌की पूजा की ।।२७।। भगवान्‌के चरणकमलोंका धोवन परम मंगलमय है। उससे जीवोंके सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने अत्यन्त भक्तिभावसे उसे अपने सिरपर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्मके मर्मज्ञ राजा बलिको प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे उसे अपने मस्तकपर रखा ।।२८।।

बलिरुवाच

स्वागतं ते नमस्तुभ्यं ब्रह्मन्किं करवाम ते । ब्रह्मर्षीणां तपः साक्षान्मन्वे त्वाऽऽर्य वपुर्धरम् ।।२९ अद्य नः पितरस्तृप्ता अद्य नः पावितं कुलम् । अद्य स्विष्टः क्रतुरयं यद् भवानागतो गृहान् ।।३० अद्याग्नयो मे सुहुता यथाविधि द्विजात्मज त्वच्चरणावनेजनैः । हतांहसो वार्भिरियं च भूरहो तथा पुनीता तनुभिः पदैस्तव ।।३१ यद् यद् वटो वाञ्छसि तत्प्रतीच्छ मे त्वामर्थिनं विप्रसुतानुतर्कये । गां काञ्चनं गुणवद् धाम मृष्टं तथान्नपेयमुत वा विप्रकन्याम् । ग्रामान् समृद्धांस्तुरगान् गजान् वा रथांस्तथार्हत्तम संप्रतीच्छ ।।३२

बलिने कहा—ब्राह्मणकुमार! आप भले पधारे। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आर्य! ऐसा जान पड़ता है कि बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियोंकी तपस्या ही स्वयं मूर्तिमान् होकर मेरे सामने आयी है ।।२९।। आज आप मेरे घर पधारे, इससे मेरे पितर तृप्त हो गये। आज मेरा वंश पवित्र हो गया। आज मेरा यह यज्ञ सफल हो गया ।।३०।। ब्राह्मणकुमार! आपके पाँव पखारनेसे मेरे सारे पाप धुल गये और विधिपूर्वक यज्ञ करनेसे, अग्निमें आहुति डालनेसे जो फल मिलता, वह अनायास ही मिल गया। आपके

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