श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1573, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहा—'अच्छी बात है; जितनी तुम्हारी इच्छा हो, उतनी ही ले लो।' यों कहकर वामनभगवान्को तीन पग पृथ्वीका संकल्प करनेके लिये उन्होंने जलपात्र उठाया ।।२८।। शुक्राचार्यजी सब कुछ जानते थे। उनसे भगवान्की यह लीला भी छिपी नहीं थी। उन्होंने राजा बलिको पृथ्वी देनेके लिये तैयार देखकर उनसे कहा ।।२९।।
शुक्राचार्यजीने कहा—विरोचनकुमार! ये स्वयं अविनाशी भगवान् विष्णु हैं। देवताओंका काम बनानेके लिये कश्यपकी पत्नी अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हुए हैं ।।३०।। तुमने यह अनर्थ न जानकर कि ये मेरा सब कुछ छीन लेंगे, इन्हें दान देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है। यह तो दैत्योंपर बहुत बड़ा अन्याय होने जा रहा है। इसे मैं ठीक नहीं समझता ।।३१।। स्वयं भगवान् ही अपनी योगमायासे यह ब्रह्मचारी बनकर बैठे हुए हैं। ये तुम्हारा राज्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, तेज और विश्वविख्यात कीर्ति—सब कुछ तुमसे छीनकर इन्द्रको दे देंगे ।।३२।। ये विश्वरूप हैं। तीन पगमें तो ये सारे लोकोंको नाप लेंगे। मूर्ख! जब तुम अपना सर्वस्व ही विष्णुको दे डालोगे, तो तुम्हारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा ।।३३।। ये विश्वव्यापक भगवान् एक पगमें पृथ्वी और दूसरे पगमें स्वर्गको नाप लेंगे। इनके विशाल शरीरसे आकाश भर जायगा। तब इनका तीसरा पग कहाँ जायगा? ।।३४।। तुम उसे पूरा न कर सकोगे। ऐसी दशामें मैं समझता हूँ कि प्रतिज्ञा करके पूरा न कर पानेके कारण तुम्हें नरकमें ही जाना पड़ेगा। क्योंकि तुम अपनी की हुई प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेमें सर्वथा असमर्थ होओगे ।।३५।। विद्वान् पुरुष उस दानकी प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन-निर्वाहके लिये कुछ बचे ही नहीं। जिसका जीवन-निर्वाह ठीक-ठीक चलता है—वही संसारमें दान, यज्ञ, तप और परोपकारके कर्म कर सकता है ।।३६।। जो मनुष्य अपने धनको पाँच भागोंमें बाँट देता है— कुछ धर्मके लिये, कुछ यशके लिये, कुछ धनकी अभिवृद्धिके लिये, कुछ भोगोंके लिये और कुछ अपने स्वजनोंके लिये—वही इस लोक और परलोक दोनोंमें ही सुख पाता है ।।३७।।
अत्रापि बह्वृचैर्गीतं शृणु मेऽसुरसत्तम । सत्यमोमिति यत् प्रोक्तं यन्नेत्याहानृतं हि तत् ।।३८
सत्यं पुष्पफलं विद्यादात्मवृक्षस्य गीयते । वृक्षेऽजीवति तन्न स्यादनृतं मूलमात्मनः ।।३९
तद् यथा वृक्ष उन्मूलः शुष्यत्युद्धर्ततेऽचिरात् । एवं नष्टानृतः सद्य आत्मा शुष्येन्न संशयः ।।४०
पराग् रिक्तमपूर्णं वा अक्षरं यत् तदोमिति । यत् किञ्चिदोमिति ब्रूयात् तेन रिच्येत वै पुमान् । भिक्षवे सर्वमोङ्कुर्वन्नालं कामेन चात्मने ।।४१