श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथैकविंशोऽध्यायः बलि का बाँधा जाना
श्रीशुक उवाच
सत्यं समीक्ष्याब्जभवो नखेन्दुभि- र्हतस्वधामद्युतिरावृतोऽभ्यगात् । मरीचिमिश्रा ऋषयो बृहद्व्रताः सनन्दनाद्या नरदेव योगिनः ॥१॥
वेदोपवेदा नियमान्विता यमा- स्तर्केतिहासाङ्गपुराणसंहिताः । ये चापरे योगसमीरदीपित- ज्ञानाग्निना रन्धितकर्मकल्मषाः । ववन्दिरे यत्स्मरणानुभावतः स्वायम्भुवं धाम गता अकर्मकम् ॥२
अथाङ्घ्रये प्रोन्नमिताय विष्णो- रुपाहरत् पद्मभवोऽर्हणोदकम् । समर्च्य भक्त्याभ्यगृणाच्छुचिश्रवा यन्नाभिपङ्केरुहसंभवः स्वयम् ॥३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्का चरणकमल सत्यलोकमें पहुँच गया। उसके नखचन्द्रकी छटासे सत्यलोककी आभा फीकी पड़ गयी। स्वयं ब्रह्मा भी उसके प्रकाशमें डूब-से गये। उन्होंने मरीचि आदि ऋषियों, सनन्दन आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारियों एवं बड़े-बड़े योगियोंके साथ भगवान्के चरणकमलकी अगवानी की ॥१॥
वेद, उपवेद, नियम, यम, तर्क, इतिहास, वेदांग और पुराण-संहिताएँ—जो ब्रह्मलोकमें मूर्तिमान् होकर निवास करते हैं—तथा जिन लोगोंने योगरूप वायुसे ज्ञानाग्निको प्रज्वलित करके कर्ममलको भस्म कर डाला है, वे महात्मा, सबने भगवान्के चरणकी वन्दना की। इसी चरणकमलके स्मरणकी महिमासे ये सब कर्मके द्वारा प्राप्त न होनेयोग्य ब्रह्माजीके धाममें पहुँचे हैं ॥२॥
भगवान् ब्रह्माकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। वे विष्णुभगवान्के नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं। अगवानी करनेके बाद उन्होंने स्वयं विश्वरूपभगवान्के ऊपर उठे हुए चरणका अर्घ्यपाद्यसे पूजन किया, प्रक्षालन किया। पूजा करके बड़े प्रेम और भक्तिसे उन्होंने भगवान्की स्तुति