भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1588

अथ द्वाविंशोऽध्यायः बलिके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और भगवान्‌का उसपर प्रसन्न होना

श्रीशुक उवाच

एवं विप्रकृतो राजन् बलिर्भगवतासुरः । भिद्यमानोऽप्यभिन्नात्मा प्रत्याहाविक्लवं वचः ॥१

बलिरुवाच

यद्युत्तमश्लोक भवान् ममेरितं वचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते । करोम्यृतं तन्न भवेत् प्रलम्भनं पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम् ॥२

बिभेमि नाहं निरयात् पदच्युतो न पाशबन्धाद् व्यसनाद् दुरत्ययात् । नैवार्थकृच्छ्राद् भवतो विनिग्रहा- दसाधुवादाद् भृशमुद्विजे यथा ॥३

पुंसां श्लाघ्यतमं मन्ये दण्डमर्हत्तमार्पितम् । यं न माता पिता भ्राता सुहृदश्चादिशन्ति हि ॥४

त्वं नूनमसुराणां नः पारोक्ष्यः परमो गुरुः । यो नोऽनेकमदान्धानां विभ्रंशं चक्षुरादिशत् ॥५

यस्मिन् वैरानुबन्धेन रूढेन विबुधेतराः । बहवो लेभिरे सिद्धिं यामु हैकान्तयोगिनः ॥६

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भगवान्ने असुरराज बलिका बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्यसे विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्यसे बोले ॥१॥

दैत्यराज बलिने कहा—देवताओंके आराध्यदेव! आपकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। क्या आप मेरी बातको असत्य समझते हैं? ऐसा नहीं है। मैं उसे सत्य कर दिखाता हूँ। आप धोखेमें

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