भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1598

वत्स प्रह्लाद भद्रं ते प्रयाहि सुतलालयम् । मोदमानः स्वपौत्रेण ज्ञातीनां सुखमावह ॥९ नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् । मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धनः ॥१०

श्रीशुक उवाच

आज्ञां भगवतो राजन् प्रह्लादो बलिना सह । बाढमित्यमलप्रज्ञो मूर्द्ध्नाधाय कृताञ्जलिः ॥११ परिक्रम्यादिपुरुषं सर्वासुरचमूपतिः । प्रणतस्तदनुज्ञातः प्रविवेश महाबिलम् ॥१२ अथाहोशनसं राजन् हरिर्नारायणोऽन्तिके । आसीनमृत्विजां मध्ये सदसि ब्रह्मवादिनाम् ॥१३ ब्रह्मन् संतनु शिष्यस्य कर्मच्छिद्रं वितन्वतः । यत् तत् कर्मसु वैषम्यं ब्रह्मदृष्टं समं भवेत् ॥१४

शुक्र उवाच

कुतस्तत्कर्मवैषम्यं यस्य कर्मेश्वरो भवान् । यज्ञेशो यज्ञपुरुषः सर्वभावेन पूजितः ॥१५ मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः । सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसंकीर्तनं तव ॥१६

श्रीभगवान्ने कहा—बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम भी सुतल लोकमें जाओ। वहाँ अपने पौत्र बलिके साथ आनन्दपूर्वक रहो और जाति-बन्धुओंको सुखी करो ।।९।।

वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथमें लिये खड़ा देखोगे। मेरे दर्शनके परमानन्दमें मग्न रहनेके कारण तुम्हारे सारे कर्मबन्धन नष्ट हो जायँगे ।।१०।।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! समस्त दैत्यसेनाके स्वामी विशुद्धबुद्धि प्रह्लादजीने 'जो आज्ञा' कहकर, हाथ जोड़, भगवान्‌का आदेश मस्तकपर चढ़ाया। फिर उन्होंने बलिके साथ आदिपुरुष भगवान्‌की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और उनसे अनुमति लेकर सुतल लोककी यात्रा की ।।११-१२।। परीक्षित्! उस समय भगवान् श्रीहरिने ब्रह्मवादी ऋत्विजोंकी सभामें अपने पास ही बैठे हुए शुक्राचार्यजीसे कहा ।।१३।। 'ब्रह्मन्! आपका शिष्य यज्ञ कर

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