श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्विंशोऽध्यायः भगवान्के मत्स्यावतारकी कथा
राजोवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि हरेरद्भुतकर्मणः । अवतारकथामाद्यां मायामत्स्यविडम्बनम् ॥१
यदर्थमदधाद् रूपं मात्स्यं लोकजुगुप्सितम् । तमःप्रकृति दुर्मर्षं कर्मग्रस्त इवेश्वरः ॥२
एतन्नो भगवन् सर्वं यथावद् वक्तुमर्हसि । उत्तमश्लोकचरितं सर्वलोकसुखावहम् ॥३
सूत उवाच
इत्युक्तो विष्णुरातेन भगवान् बादरायणिः । उवाच चरितं विष्णोर्मत्स्यरूपेण यत् कृतम् ॥४
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवान्के कर्म बड़े अद्भुत हैं। उन्होंने एक बार अपनी योगमायासे मत्स्यावतार धारण करके बड़ी सुन्दर लीला की थी, मैं उनके उसी आदि-अवतारकी कथा सुनना चाहता हूँ ॥१॥ भगवन्! मत्स्ययोनि एक तो यों ही लोकनिन्दित है, दूसरे तमोगुणी और असह्य परतन्त्रतासे युक्त भी है। सर्वशक्तिमान् होनेपर भी भगवान्ने कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवकी तरह यह मत्स्यका रूप क्यों धारण किया? ॥२॥ भगवन्! महात्माओंके कीर्तनीय भगवान्का चरित्र समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाला है। आप कृपा करके उनकी वह सब लीला हमारे सामने पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये ॥३॥
सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित्ने भगवान् श्रीशुकदेवजीसे यह प्रश्न किया, तब उन्होंने विष्णुभगवान्का वह चरित्र जो उन्होंने मत्स्यावतार धारण करके किया था, वर्णन किया ॥४॥
श्रीशुक उवाच
गोविप्रसुरसाधूनां छन्दसामपि चेश्वरः । रक्षामिच्छंस्तनूर्धत्ते धर्मस्यार्थस्य चैव हि ॥५
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