श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमोऽध्यायः भगवान्के यश-कीर्तनकी महिमा और देवर्षि नारदजीका पूर्वचरित्र
सूत उवाच
अथ तं सुखमासीन उपासीनं बृहच्छ्रवाः । देवर्षिः प्राह विप्रर्षिं वीणापाणिः स्मयन्निव ।।१
नारद उवाच
पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना । परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ।।२ जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्भुतम् । कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ।।३ जिज्ञासितमधीतं च यत्तद्ब्रह्म सनातनम् । अथापि² शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ।।४
व्यास उवाच
अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं तथापि नात्मा परितुष्यते मे । तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं पृच्छाम हे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ।।५ स वै भवान् वेद समस्तगुह्य- मुपासितो यत्पुरुषः पुराणः । परावरेशो मनसैव विश्वं सृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः ।।६
सूतजी कहते हैं—तदनन्तर सुखपूर्वक बैठे हुए वीणापाणि परम यशस्वी देवर्षि नारदने मुसकराकर अपने पास ही बैठे ब्रह्मर्षि व्यासजीसे कहा ।।१।।
नारदजीने प्रश्न किया—महाभाग व्यासजी! आपके शरीर एवं मन—दोनों ही अपने कर्म एवं चिन्तनसे सन्तुष्ट हैं न? ।।२।। अवश्य ही आपकी जिज्ञासा तो भलीभाँति पूर्ण हो गयी है; क्योंकि आपने जो यह महाभारतकी रचना की है, वह बड़ी ही अद्भुत है। वह धर्म आदि