श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगये, जैसे दिनके बीत जानेपर पक्षियोंका कलरव शान्त हो जाता है ।।४४।। उस समय देवता और मनुष्य नगारे बजाने लगे। साधुस्वभावके राजा उनकी प्रशंसा करने लगे और आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ।।४५।।
तस्य निर्हरणादीनि सम्परेतस्य भार्गव ।
युधिष्ठिरः कारयित्वा मुहूर्तं दुःखितोऽभवत् ।।४६
तुष्टुवुर्मुनयो हृष्टाः कृष्णं तद्गुह्यनामभिः ।
ततस्ते कृष्णहृदयाः स्वाश्रमान् प्रययुः पुनः ।।४७
ततो युधिष्ठिरो गत्वा सहकृष्णो गजाह्वयम् ।
पितरं सान्त्वयामास गान्धारीं च तपस्विनीम् ।।४८
पित्रा चानुमतो राजा वासुदेवानुमोदितः ।
चकार राज्यं धर्मेण पितृपैतामहं विभुः ।।४९
शौनकजी! युधिष्ठिरने उनके मृत शरीरकी अन्त्येष्टि क्रिया करायी और कुछ समयके लिये वे शोकमग्न हो गये ।।४६।। उस समय मुनियोंने बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णकी उनके रहस्यमय नाम ले-लेकर स्तुति की। इसके पश्चात् अपने हृदयोंको श्रीकृष्णमय बनाकर वे अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये ।।४७।। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युधिष्ठिर हस्तिनापुर चले आये और उन्होंने वहाँ अपने चाचा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारीको ढाढस बँधाया ।।४८।। फिर धृतराष्ट्रकी आज्ञा और भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे समर्थ राजा युधिष्ठिर अपने वंशपरम्परागत साम्राज्यका धर्मपूर्वक शासन करने लगे ।।४९।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे युधिष्ठिरराज्यप्रलम्भो नाम नवमोऽध्यायः ।।९।।
१. प्रा० पा०—सन्नतान्। २. प्रा० पा०—कृच्छ्रं। ३. प्रा० पा०—संस्थिते विरथे।
१. प्रा० पा०—मुनिः। २. प्रा० पा०—भूतानु०। ३. प्रा० पा०—सर्व०।
१. प्रा० पा०—विमुक्तसङ्गो। २. प्रा० पा०—हृता। ३. प्रा० पा०—मति०।
१. प्रा० पा०—नति०। २. प्रा० पा०—व्यवसित०। ३. प्रा० पा०—धर्मबुद्ध्या।
१. प्रा० पा०—मनोवाग्वृत्तिदृष्टिभिः। २. प्रा० पा०—दिवात्यये। ३. प्रा० पा०—दानव०।