श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरते हुए और मांगलिक सामग्रियोंसे सुसज्जित ब्राह्मणोंको साथ लेकर चले। शंख और तुरही आदि बाजे बजने लगे और वेदध्वनि होने लगी। वे सब हर्षित होकर रथोंपर सवार हुए और बड़ी आदरबुद्धिसे भगवान्की अगवानी करने चले ।।१६-१८।। साथ ही भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये उत्सुक सैकड़ों श्रेष्ठ वारांगनाएँ, जिनके मुख कपोलोंपर चमचमाते हुए कुण्डलोंकी कान्ति पड़नेसे बड़े सुन्दर दीखते थे, पालकियोंपर चढ़कर भगवान्की अगवानीके लिये चलीं ।।१९।। बहुत-से नट, नाचनेवाले, गानेवाले, विरद बखाननेवाले सूत, मागध और वंदीजन भगवान् श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रोंका गायन करते हुए चले ।।२०।।
प्रद्युम्नश्चारुदेष्णश्च साम्बो१ जाम्बवतीसुतः । प्रहर्षवेगोच्छशितशयनासनभोजनाः ।।१७
वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य ब्राह्मणैः२ ससुमङ्गलैः । शङ्खतूर्यनिनादेन ब्रह्मघोषेण चादृताः । प्रत्युज्जग्मू३ रथैर्हृष्टाः४ प्रणयागतसाध्वसाः ।।१८
वारमुख्याश्च शतशो यानैस्तद्दर्शनोत्सुकाः । लसत्कुण्डलनिर्भातकपोलवदनश्रियः५ ।।१९
नटनर्तकगन्धर्वाः सूतमागधवन्दिनः । गायन्ति६चोत्तमश्लोकचरितान्यद्भुतानि च ।।२०
भगवांस्तत्र बन्धूनां पौराणामनुवर्तिनाम् । यथाविध्युपसङ्गम्य सर्वेषां मानमादधे ।।२१
प्रह्वाभिवादनाश्लेषकरस्पर्शस्मितेक्षणैः७ । आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः ।।२२
स्वयं च गुरुभिर्विप्रैः सदारैः स्थविरैरपि । आशीर्भिर्युज्यमानोऽन्यैर्वन्दिभिश्चाविशत्पुरम्८ ।।२३
राजमार्गं गते कृष्णे द्वारकायाः९ कुलस्त्रियः । हर्म्याण्यारुरुहुर्विप्र तदीक्षणमहोत्सवाः ।।२४