श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकभी लिप्त नहीं होते, जैसे भगवान्की शरणागत बुद्धि अपनेमें रहनेवाले प्राकृत गुणोंसे लिप्त नहीं होती ।।३८।।
तं मेनिरेऽबला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं रहः । अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ।।३९
वे मूढ़ स्त्रियाँ भी श्रीकृष्णको अपना एकान्तसेवी, स्त्रीपरायण भक्त ही समझ बैठी थीं; क्योंकि वे अपने स्वामीके ऐश्वर्यको नहीं जानती थीं—ठीक वैसे ही जैसे अहंकारकी वृत्तियाँ ईश्वरको अपने धर्मसे युक्त मानती हैं ।।३९।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने कृष्णद्वारकाप्रवेशो नामैकादशोऽध्यायः ।।११।।
१. प्रा० पा०—शङ्खवरं। २. परः प्रभो। ३. प्रा० पा०—मातात्मसुहृत्पिता पतिः।
१. प्रा० पा०—प्राचीन प्रतिमें नवम श्लोकके बाद एक श्लोक अधिक है, जो इस प्रकार है—'कथं वयं नाथ विरोषिते त्वयि प्रसन्नदृष्ट्याखिलतापशोषणम् । जीवाम ते सुन्दरहासशोभितमपश्यमाना वदनं मनोहरम् ।।'
२. प्रा० पा०—पुरम्। ३. प्रा० पा०—दीपधूपकैः।
१. प्रा० पा०—चारुसाम्बगदादयः। २. प्रा० पा०—ब्राह्मणैस्तु सुमङ्गलैः। ३. प्रा० पा०—प्रतिजग्मुः। ४. प्रा० पा०—रथैर्ब्रह्मन्। ५. प्रा० पा०—निर्भिन्ना०। ६. प्रा० पा०—गायन्त उत्तमश्लोक०। ७. प्रा० पा०—बान्धवानथ आश्लिष्य। ८. प्रा० पा०—पुरीम्। ९. प्रा० पा०—द्वारकायां।
१. प्रा० पा०—सहसासनाश्रयात्सकञ्चुका व्रीडित० ।
* जिस स्त्रीका पति विदेश गया हो, उसे इन नियमोंका पालन करना चाहिये ।
क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् ।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषितभर्तृका ।।
जिसका पति परदेश गया हो, उस स्त्रीको खेल-कूद, शृंगार, सामाजिक उत्सवोंमें भाग लेना, हँसी-मजाक करना और पराये घर जाना—इन पाँच कामोंको त्याग देना चाहिये। (याज्ञवल्क्यस्मृति)