श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशौनकादि ऋषियो! उनके पास अतुल सम्पत्ति थी, उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे तथा उनके फलस्वरूप श्रेष्ठ लोकोंका अधिकार प्राप्त किया था। उनकी रानियाँ और भाई अनुकूल थे, सारी पृथ्वी उनकी थी, वे जम्बूद्वीपके स्वामी थे और उनकी कीर्ति स्वर्गतक फैली हुई थी ॥५॥ उनके पास भोगकी ऐसी सामग्री थी, जिसके लिये देवतालोग भी लालायित रहते हैं। परन्तु जैसे भूखे मनुष्यको भोजनके अतिरिक्त दूसरे पदार्थ नहीं सुहाते, वैसे ही उन्हें भगवान्के सिवा दूसरी कोई वस्तु सुख नहीं देती थी ॥६॥
मातुर्गर्भगतो वीरः स तदा भृगुनन्दन । ददर्श पुरुषं कञ्चिद्दह्यमानोऽस्त्रतेजसा ॥७
अङ्गुष्ठमात्रममलं स्फुरत्पुरटमौलिनम् । अपीच्यदर्शनं श्यामं तडिद्वाससमच्युतम् ॥८
श्रीमद्दीर्घचतुर्बाहुं तप्तकाञ्चनकुण्डलम् । क्षतजाक्षं १ गदापाणिमात्मनः सर्वतोदिशम् । परिभ्रमन्तमुल्काभां भ्रामयन्तं गदां मुहुः ॥९
अस्त्रतेजः स्वगदया नीहारमिव गोपतिः । विधमन्तं संनिकर्षे पर्येक्षत क इत्यसौ ॥१०
विधूय तदमेयात्मा भगवान्धर्मगुब् विभुः । मिषतो दशमास्यस्य तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥११
ततः सर्वगुणोदर्के सानुकूलग्रहोदये । जज्ञे वंशधरः पाण्डोर्भूयः पाण्डुरिवौजसा ॥१२
तस्य प्रीतमना राजा विप्रैर्धौम्यकृपादिभिः २ । जातकं कारयामास वाचयित्वा च मङ्गलम् ॥१३
हिरण्यं गां महीं ग्रामान् हस्त्यश्वान्नृपतिर्वरान् ३ । प्रादात्स्वन्नं ४ च विप्रेभ्यः प्रजातीर्थे स तीर्थवित् ॥१४
शौनकजी! उत्तराके गर्भमें स्थित वह वीर शिशु परीक्षित् जब अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रके तेजसे जलने लगा, तब उसने देखा कि उसकी आँखोंके सामने एक ज्योतिर्मय पुरुष है ॥७॥