भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

इसी समय स्वजनोंके वधका प्रायश्चित्त करनेके लिये राजा युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञके द्वारा भगवान्‌की आराधना करनेका विचार किया, परन्तु प्रजासे वसूल किये हुए कर और दण्ड (जुर्माने)-की रकमके अतिरिक्त और धन न होनेके कारण वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये ।।३२।। उनका अभिप्राय समझकर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे उनके भाई उत्तर दिशामें राजा मरुत्त और ब्राह्मणोंद्वारा छोड़ा हुआ* बहुत-सा धन ले आये ।।३३।। उससे यज्ञकी सामग्री एकत्र करके धर्मभीरु महाराज युधिष्ठिरने तीन अश्वमेधयज्ञोंके द्वारा भगवान्‌की पूजा की ।।३४।। युधिष्ठिरके निमन्त्रणसे पधारे हुए भगवान् ब्राह्मणोंद्वारा उनका यज्ञ सम्पन्न कराकर अपने सुहृद् पाण्डवोंकी प्रसन्नताके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे ।।३५।।

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञातः कृष्णया सह बन्धुभिः ।
ययौ द्वारवतीं ब्रह्मन् सार्जुनो यदुभिर्वृतः ।।३६

शौनकजी! इसके बाद भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिर और द्रौपदीसे अनुमति लेकर अर्जुनके साथ यदुवंशियोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकाके लिये प्रस्थान किया ।।३६।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने
परीक्षिञ्जन्माद्युत्कर्षो नाम द्वादशोऽध्यायः ।।१२।।


१. प्रा० पा०—अश्वत्थाम्ना विसृष्टेन। २. प्रा० पा०—अपालयद्। ३. प्रा० पा०—पादानुसेवया। ४. प्रा० पा०—द्विज।
१. प्रा० पा०—शङ्खचक्रगदा०। २. प्रा० पा०—विप्रैर्जातक्रियादिभिः। ३. प्रा० पा०—हयांश्च नृपति०। ४. प्रा० पा०—प्रादात्स्वयं च।
* नालच्छेदनसे पहले सूतक नहीं होता, जैसे कहा है—'यावन्न छिद्यते नालं तावन्नाप्नोति सूतकम् । छिन्ने नाले ततः पश्चात् सूतकं तु विधीयते ।।' इसी समयको 'प्रजातीर्थ' काल कहते हैं। इस समय जो दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है। स्मृति कहती है—'पुत्रे जाते व्यतीपाते दत्तं भवति चाक्षयम् ।' अर्थात् 'पुत्रोत्पत्ति' और व्यतीपातके समय दिया हुआ दान अक्षय होता है।'
१. प्रा० पा०—पौरवर्षभः। २. प्रा० पा०—यो। ३. प्रा० पा०—राजोवाच। ४. प्रा० पा०—राजर्षिः। ५. प्रा० पा०—यथोचितविधाता च दौष्यन्ति। ६. प्रा० पा०—माहात्म्यमेष कृष्ण०। ७. प्रा० पा०—निर्भरः।
१. प्रा० पा०—पूर्वदृष्ट०। २. दध्यौ नान्यत्र। ३. प्रा० पा०—त्रिभी राजा यज्ञैः ।
* पूर्वकालमें महाराज मरुत्तने ऐसा यज्ञ किया था, जिसमें सभी पात्र सुवर्णके थे। यज्ञ समाप्त हो जानेपर उन्होंने वे पात्र उत्तर दिशामें फिंकवा दिये थे। उन्होंने ब्राह्मणोंको भी इतना धन दिया कि वे उसे ले जा न सके; वे भी उसे उत्तर दिशामें ही छोड़कर चले आये। परित्यक्त

श्रीमद्भागवत महापुराण · पृष्ठ 248, कुल 1617 में से · BharatKosha