भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 252

अवश्य ही होगा ॥११॥

युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर विदुरजीने तीर्थों और यदुवंशियोंके सम्बन्धमें जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया था, सब क्रमसे बतला दिया, केवल यदुवंशके विनाशकी बात नहीं कही ॥१२॥ करुणहृदय विदुरजी पाण्डवोंको दुःखी नहीं देख सकते थे। इसलिये उन्होंने यह अप्रिय एवं असह्य घटना पाण्डवोंको नहीं सुनायी; क्योंकि वह तो स्वयं ही प्रकट होनेवाली थी ॥१३॥

पाण्डव विदुरजीका देवताके समान सेवा-सत्कार करते थे। वे कुछ दिनोंतक अपने बड़े भाई धृतराष्ट्रकी कल्याणकामनासे सब लोगोंको प्रसन्न करते हुए सुखपूर्वक हस्तिनापुरमें ही रहे ॥१४॥ विदुरजी तो साक्षात् धर्मराज थे, माण्डव्य ऋषिके शापसे ये सौ वर्षके लिये शूद्र बन गये थे*। इतने दिनोंतक यमराजके पदपर अर्यमा थे और वही पापियोंको उचित दण्ड देते थे ॥१५॥ राज्य प्राप्त हो जानेपर अपने लोकपालों-सरीखे भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर वंशधर परीक्षित्को देखकर अपनी अतुल सम्पत्तिसे आनन्दित रहने लगे ॥१६॥ इस प्रकार पाण्डव गृहस्थके काम-धंधोंमें रम गये और उन्हींके पीछे एक प्रकारसे यह बात भूल गये कि अनजानमें ही हमारा जीवन मृत्युकी ओर जा रहा है; अब देखते-देखते उनके सामने वह समय आ पहुँचा जिसे कोई टाल नहीं सकता ॥१७॥

युधिष्ठिरो लब्धराज्यो दृष्ट्वा पौत्रं कुलंधरम्¹ । भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्मुमुदे परया श्रिया ॥१६ एवं गृहेषु सक्तानां प्रमत्तानां तदीहया । अत्यक्रामदविज्ञातः कालः परमदुस्तरः ॥१७ विदुरस्तदभिप्रेत्य धृतराष्ट्रमभाषत । राजन्निर्गम्यतां शीघ्रं पश्येदं भयमागतम् ॥१८ प्रतिक्रिया² न यस्येह कुतश्चित्कर्हिचित्प्रभो । स एव भगवान् कालः सर्वेषां नः³ समागतः ॥१९ येन चैवाभिपन्नोऽयं प्राणैः प्रियतमैरपि । जनः सद्यो वियुज्येत किमुतान्यैर्धनादिभिः ॥२० पितृभ्रातृसुहृत्पुत्रा हतास्ते विगतं वयः । आत्मा च जरया ग्रस्तः परगेहमुपाससे ॥२१ अहो महीयसी जन्तोर्जीविताशा यया भवान् । भीमापवर्जितं पिण्डमादत्ते गृहपालवत् ॥२२ अग्निर्निस्सृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिताः । हृतं क्षेत्रं धनं येषां तद्दत्तैरसुभिः कियत् ॥२३

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