श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौभाग्यका अब अन्त हो गया! भगवान्ने मुझ अभागिनीको छोड़ दिया! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्यपर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है ।।३२-३३।।
तुम अपने तीन चरणोंके कम हो जानेसे मन-ही-मन कुढ़ रहे थे; अतः अपने पुरुषार्थसे तुम्हें अपने ही अन्दर पुनः सब अंगोंसे पूर्ण एवं स्वस्थ कर देनेके लिये वे अत्यन्त रमणीय श्यामसुन्दर विग्रहसे यदुवंशमें प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भारको, जो असुरवंशी राजाओंकी सैकड़ों अक्षौहिणियोंके रूपमें था, नष्ट कर डाला। क्योंकि वे परम स्वतन्त्र थे ।।३४।। जिन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवन, मनोहर मुसकान और मीठी-मीठी बातोंसे सत्यभामा आदि मधुमयी मानिनियोंके मानके साथ धीरजको भी छीन लिया था और जिनके चरणकमलोंके स्पर्शसे मैं निरन्तर आनन्दसे पुलकित रहती थी, उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका विरह भला कौन सह सकती है ।।३५।।
धर्म और पृथ्वी इस प्रकार आपसमें बातचीत कर ही रहे थे कि उसी समय राजर्षि परीक्षित् पूर्ववाहिनी सरस्वतीके तटपर आ पहुँचे ।।३६।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पृथ्वीधर्मसंवादो४ नाम षोडशोऽध्यायः ।।१६।।
१. प्रा० पा०—विष्णु । २. प्रा० पा०—भगवानुपहूतो महर्षिभिः। १. प्रा० पा०—शौण्ड आददे। २. प्रा० पा०—गीयमानं च पुरतः। ३. प्रा० पा०—स्म। १. प्रा० पा०—धरोवाच। २. प्रा० पा०—भवानेव हि तद्वेद यन्मां। ३. प्रा० पा०—दानं त्यागः। ४. प्रा० पा०—धृतिः। ५. प्रा० पा०—कान्तिः सौभाग्यं मार्दवं क्षमा। ६. प्रा० पा०—इमे। १. प्रा० पा०—यदर्निशं। २. प्रा० पा०—तपोव्रतधरा भगव०। ३. प्रा० पा०—तपोविभूतिं। ४. प्रा० पा०—पारिक्षिते षोड०।