श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूतजी कहते हैं—कलियुगकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा परीक्षित्ने उसे चार स्थान दिये—द्यूत, मद्यपान, स्त्री-संग और हिंसा। इन स्थानोंमें क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता—ये चार प्रकारके अधर्म निवास करते हैं ।।३८।।
उसने और भी स्थान माँगे। तब समर्थ परीक्षित्ने उसे रहनेके लिये एक और स्थान—'सुवर्ण' (धन)—दिया। इस प्रकार कलियुगके पाँच स्थान हो गये—झूठ, मद, काम, वैर और रजोगुण ।।३९।।
परीक्षित्के दिये हुए इन्हीं पाँच स्थानोंमें अधर्मका मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओंका पालन करता हुआ निवास करने लगा ।।४०।।
इसलिये आत्मकल्याणकामी पुरुषको इन पाँचों स्थानोंका सेवन कभी नहीं करना चाहिये। धार्मिक राजा, प्रजावर्गके लौकिक नेता और धर्मोपदेष्टा गुरुओंको तो बड़ी सावधानीसे इनका त्याग करना चाहिये ।।४१।।
राजा परीक्षित्ने इसके बाद वृषभरूप धर्मके तीनों चरण—तपस्या, शौच और दया जोड़ दिये और आश्वासन देकर पृथ्वीका संवर्धन किया ।।४२।।
वे ही महाराजा परीक्षित् इस समय अपने राजसिंहासनपर, जिसे उनके पितामह महाराज युधिष्ठिरने वनमें जाते समय उन्हें दिया था, विराजमान हैं। ।।४३।।
वे परम यशस्वी सौभाग्यभाजन चक्रवर्ती सम्राट् राजर्षि परीक्षित् इस समय हस्तिनापुरमें कौरव-कुलकी राज्यलक्ष्मीसे शोभायमान हैं ।।४४।।
इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः ।
यस्य पालयतः क्षोणीं यूयं सत्राय दीक्षिताः ।।४५
अभिमन्युनन्दन राजा परीक्षित् वास्तवमें ऐसे ही प्रभावशाली हैं, जिनके शासनकालमें आपलोग इस दीर्घकालीन यज्ञके लिये दीक्षित हुए हैं$^*$ ।।४५।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे कलिनिग्रहो नाम
सप्तदशोऽध्यायः ।।१७।।
१. प्रा० पा०—पीडितम्। २. प्रा० पा०—कृशां।
१. प्रा० पा०—मातर्हिंस्यन्ते। २. प्रा० पा०—राज्ञः। ३. प्रा० पा० चतुष्पदः। ४. प्रा० पा०—यतस्व।
१. प्रा० पा०—प्रेक्ष्य। २. प्रा० पा०—बद्धाञ्जलेस्ते। ३. प्रा० पा०—इष्टात्ममूर्तिं०।
१. प्रा० पा०—क्व चाथ। २. प्रा० पा०—मदः कामो। ३. प्रा० पा०—आस्थाय—४. प्रा० पा०—एतदध्यास्त।
$^*$ ४३ से ४५ तकके श्लोकोंमें महाराज परीक्षित्का वर्तमानके समान वर्णन किया गया