भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 30

ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिःसप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ।।१५।। श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । दक्षिणां समर्पयामि । —इस मन्त्रसे दक्षिणा समर्पित करे । ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे । सर्वाणि भूतानि विचिन्त्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते ।।१६।। श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । नमस्कारं समर्पयामि । ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् परिश्रेश्चतस्रः । तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।।१७।। श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । प्रदक्षिणां समर्पयामि । —इस मन्त्रसे प्रदक्षिणा समर्पण करे । ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा- स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।।१८।। श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । मन्त्रपुष्पं समर्पयामि । —इस मन्त्रसे पुष्पांजलि समर्पित करे ।


१—सर्वान्तर्यामी परमात्मा इस समस्त ब्रह्माण्डकी भूमिको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हैं और इससे दस अंगुल ऊपर भी हैं। अर्थात् ब्रह्माण्डमें व्यापक होते हुए वे इससे परे भी हैं। उन परमात्माके मस्तक, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और चरण आदि कर्मेन्द्रियाँ हजारों हैं—असंख्य हैं।

२—यह जो कुछ इस समय वर्तमान है, सब परमात्माका ही स्वरूप है, भूत और भविष्य जगत् भी परमात्मा ही है। इतना ही नहीं, वह परमात्मा मुक्तिका स्वामी है, तथापि ये जो अन्नसे उत्पन्न होनेवाले जीव हैं, उन सबका भी शासन—सबको नियमके अंदर रखनेवाला वह परमात्मा ही है।

३—भूत, भविष्य और वर्तमान कालसे सम्बन्ध रखनेवाला जितना भी जगत् है—यह

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