भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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विष्णुका परमपद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेमरूप आनन्दसे भर जाता है ।।१९।। यदि भगवान्का ध्यान करते समय मन रजोगुणसे विक्षिप्त या तमोगुणसे मूढ़ हो जाय तो घबराये नहीं। धैर्यके साथ योगधारणाके द्वारा उसे वशमें करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणोंके दोषोंको मिटा देती है ।।२०।। धारणा स्थिर हो जानेपर ध्यानमें जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्)-को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाती है ।।२१।।

गृहात् प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थजलाप्लुतः १ । शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने ।।१६

अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम् । मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन् २ ।।१७

नियच्छेदिन्द्रियेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः । मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ।।१८

तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा । मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् । पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ।।१९

रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढं मन आत्मनः । यच्छेद्धारण्या धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम् ।।२०

यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः । आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ।।२१

राजोवाच

यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता । यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ।।२२

श्रीशुक उवाच

जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः ।