भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ज्योतिर्मय चक्रपर पहुँचता है ॥२४॥

तद् विश्वनाभिं त्वतिवर्त्य विष्णो- रणीयसा विरजेनात्मनैकः । नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्$^१$ विबुधा रमन्ते ॥२५

अथो अनन्तस्य मुखानलेन दन्दह्यमानं स निरीक्ष्य विश्वम् । निर्याति सिद्धेश्वरजुष्टधिष्ण्यं$^२$ यद् द्वैपरार्ध्यं तदु पारमेष्ठ्यम् ॥२६

न यत्र शोको न जरा न मृत्यु- र्नार्तिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित् । यच्चित्ततोऽदः कृपयानिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥२७

ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय- स्तेनात्मनापोऽनलमूर्तिरत्वरन् । ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥२८

घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं रूपं तु दृष्ट्या श्वसनं त्वचैव । श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणत्वं प्राणेन चाकूतिमुपैति योगी ॥२९

भगवान् विष्णुका यह शिशुमार चक्र विश्व-ब्रह्माण्डके भ्रमणका केन्द्र है। उसका अतिक्रमण करके अत्यन्त सूक्ष्म एवं निर्मल शरीरसे वह अकेला ही महर्लोकमें जाता है। वह लोक ब्रह्मवेत्ताओंके द्वारा भी वन्दित है और उसमें कल्पपर्यन्त जीवित रहनेवाले देवता विहार करते रहते हैं ॥२५॥

फिर जब प्रलयका समय आता है, तब नीचेके लोकोंको शेषके मुखसे निकली हुई आगके द्वारा भस्म होते देख वह ब्रह्मलोकमें चला जाता है, जिस ब्रह्मलोकमें बड़े-बड़े सिद्धेश्वर विमानोंपर निवास करते हैं। उस ब्रह्मलोककी आयु ब्रह्माकी आयुके समान ही दो परार्द्धकी है ॥२६॥

वहाँ न शोक है न दुःख, न बुढ़ापा है न मृत्यु। फिर वहाँ किसी प्रकारका उद्वेग या भय तो हो ही कैसे सकता है। वहाँ यदि दुःख है तो केवल एक बातका। वह यही कि इस परमपदको न जाननेवाले लोगोंके जन्म-मृत्युमय अत्यन्त घोर संकटोंको देखकर

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