श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्वितीयोऽध्यायः ।।२।।
१. प्रा० पा०—भावयन्। २. प्रा० पा०—चात्मनि। ३. प्रा० पा०—मनश्च बुद्ध्या।
४. प्रा० पा०—क्षेत्रज्ञमेतं निनयेद् य आत्मनि।
१. प्रा० पा०—विबुधा यद्रमन्ते। २. प्रा० पा०—विश्वेश्वर०।
१. प्राचीन प्रतिमें ‘स भूतसूक्ष्मे.....’ से लेकर ‘.....ऽवसाने’ तक डेढ़ श्लोककी जगह कुछ परिवर्तनके साथ दो चरण और बढ़ाकर पूरे दो श्लोक मिलते हैं, यथा—
‘स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षात् सनातनोऽसौ भगवाननादिः ।
अनामयं देवमयं विकार्यं संसाद्य गत्या सह तेन याति ।।१।।
विज्ञानतत्त्वं गुणसन्निरोधं तेनात्मनात्मानमुपैति शान्तम् ।
आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे ।।२।।
इसके आगे मूलके ही अनुसार है ।
२. प्रा० पा०—च। ३. प्रा० पा०—यद्वै।