भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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निर्विघ्न पूर्ण हो—इसके लिये गणेशमन्त्र, द्वादशाक्षरमन्त्र तथा गायत्री-मन्त्रका जप और विष्णुसहस्रनाम एवं गीताका पाठ करनेके लिये अपनी शक्तिके अनुसार सात, पाँच या तीन ब्राह्मणोंका वरण करे। श्रीमद्भागवतका भी एक पाठ अलग ब्राह्मणद्वारा कराये। देवताओंकी स्थापना और पूजाके पहले स्वस्तिवाचनपूर्वक हाथमें पवित्री, अक्षत, फूल, जल और द्रव्य लेकर एक महासंकल्प कर लेना चाहिये। संकल्प इस प्रकार है—

ॐ तत्सद्य श्रीमहाभागवतो विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते विष्णुप्रजापतिक्षेत्रे वैवस्वतमन्वभोग्यैकसप्ततियुगचतुष्ट्यान्तर्गताष्टाविंशति-तमकलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे अमुकसवंतसरे अमुकायने अमुकतौँ अमुकराशिस्थिते भगवति सवितरि अमुकामुकराशिस्थितेषु चान्येषु ग्रहेषु महामाङ्गल्यप्रदे मासानामुत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकमुहूर्तकरणादियुतायाम् अमुकतिथौ अमुकगोत्रः अमुकप्रवरः अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं पूर्वातीतानेकजन्मसंचिताखिलदुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहि- काध्यात्मिकादिविविधतापापापनोदार्थं दशाश्वमेध- यज्ञजन्यसम्यगिष्टराजसूययज्ञसहस्रपुण्यसमपुण्यचन्द्रसूर्यग्रहणकालिकबहुब्राह्मणस- सर्वरत्नोपशोभितमहीदानपुण्यप्राप्तये श्रीगोविन्द-चरणारविन्दयुगले निरन्तरमुत्तरोत्तरमेधमाननिस्सीम प्रेमोपलब्धये तदीयपरमानन्दमयगोलोकधाम्नि नित्यनिवासपूर्वकतत्परिचर्यारसास्वादनसौभाग्यसिद्धये च अमुकगोत्रामुकप्रवरामुकशर्मब्राह्मणवदना-रविन्दाच्छ्रीकृष्णवाङ्मयमूर्तिभूतं श्रीमद्भागवतमष्टादशपुराणप्रकृतिभूतमनकश्रोतृश्रवणपूर्वकममुकदिनादारभ्यामुकां सप्ताहयज्ञरूपतया श्रोष्यामि* प्राप्स्यमानेऽस्मिन् सप्ताहयज्ञे विघ्नपूगनिवारणपूर्वकं यज्ञरक्षाकरणार्थं गणपतिब्रह्मादिसहितनवग्रह- षोडशमातृकासप्तचिरजीविपुरुषसर्वतोभद्रमण्डलस्थ-देवकलशाद्यार्चनपुरस्सरं श्रीलक्ष्मीनारायण-प्रतिमाशालीग्रामनरनारायणगुरुवायुसरस्वतीशेषसनत्कुमार- सांख्सायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवत्रय्यारुणिकश्यप- रामशिष्याकृतव्रणवैशम्पायनहारीतनारदपूजनमाधारपीठ-पुस्तकव्यासपूजनं च यथालब्धोपचारैः करिष्ये।

संकल्पके पश्चात् पूर्वोक्त देवताओंके चित्रपटमें अथवा अक्षत-पुंजपर उनका आवाहन-स्थापन करके वैदिक-पूजा-पद्धतिके अनुसार उन सबकी पूजा करनी चाहिये। सप्तचिरजीवीपुरुषों तथा सनत्कुमार आदिका पूजन नाम-मन्त्रद्वारा करना चाहिये ।

कथामण्डपमें चारों दिशाओं या कोणोंमें एक-एक कलश और मध्यभागमें एक कलश—इस प्रकार पाँच कलश स्थापित करने चाहिये। चारों ओरके चार कलशोंमेंसे पूर्वके कलशपर ऋग्वेदकी, दक्षिण कलशपर यजुर्वेदकी, पश्चिम कलशपर सामवेदकी और उत्तर कलशपर अथर्ववेदकी स्थापना एवं पूजा करनी चाहिये। कोई-कोई मध्यमें

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