श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्म भी प्रकट हो गया ॥२४॥
गतिं जिगीषतः पादौ रुरुहातेऽभिकामिकाम् । पद्भ्यां यज्ञः स्वयं हव्यं कर्मभिः क्रियते नृभिः१ ॥२५
निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिनः । उपस्थ आसीत् कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम् ॥२६
उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् । ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥२७
आसिसृप्सोः पुरः पुर्या नाभिद्वारमपानतः । तत्रापानस्ततो मृत्युः पृथक्त्वमुभयाश्रयम् ॥२८
आदित्सोरन्नपानानामासन् कुक्ष्यन्त्रनाडयः । नद्यः समुद्राश्च तयोस्तुष्टिः पुष्टिस्तदाश्रये ॥२९
निदिध्यासोरात्ममायां हृदयं निरभिद्यत । ततो मनस्ततश्चन्द्रः२ सङ्कल्पः काम एव च ॥३०
त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्थिधातवः । भूम्यप्तेजोमयाः सप्त प्राणो व्योमाम्बुवायुभिः ॥३१
गुणात्मकानीन्द्रियाणि३ भूतादिप्रभवा गुणाः । मनः सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी ॥३२
जब उन्हें अभीष्ट स्थानपर जानेकी इच्छा हुई, तब उनके शरीरमें पैर उग आये। चरणोंके साथ ही चरण-इन्द्रियके अधिष्ठातारूपमें वहाँ स्वयं यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु स्थित हो गये और उन्हींमें चलनारूप कर्म प्रकट हुआ। मनुष्य इसी चरणेन्द्रियसे चलकर यज्ञ-सामग्री एकत्र करते हैं ॥२५॥ सन्तान, रति और स्वर्ग-भोगकी कामना होनेपर विराट् पुरुषके शरीरमें लिंगकी उत्पत्ति हुई। उसमें उपस्थेन्द्रिय और प्रजापति देवता तथा इन दोनोंके आश्रय रहनेवाले कामसुखका आविर्भाव हुआ ॥२६॥ जब उन्हें मलत्यागकी इच्छा हुई, तब गुदाद्वार प्रकट हुआ। तत्पश्चात् उसमें पायु-इन्द्रिय और मित्र-देवता उत्पन्न हुए। इन्हीं दोनोंके द्वारा मलत्यागकी क्रिया सम्पन्न होती है ॥२७॥ अपानमार्गद्वारा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी इच्छा होनेपर नाभिद्वार प्रकट हुआ। उससे अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनोंके
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