भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 407, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 407

मायाकिरातो गिरिशस्तुतोष ।।३८

यमावुतस्वित्तनयौ पृथायाः पार्थैर्वृतौ पक्ष्मभिरक्षिणीव । रेमात उद्दाय मृधे स्वरिक्थं परात्सुपर्णाविव वज्रिवक्त्रात् ।।३९

अहो पृथापि ध्रियतेऽर्भकार्थे राजर्षिवर्येण विनापि तेन । यस्त्वेकवीरोऽधिरथो विजिग्ये धनुर्द्वितीयः ककुभश्चतस्रः ।।४०

सौम्यानुशोचे तमधःपतन्तं भ्रात्रे परेताय विदुद्रुहे यः । निर्यापितो येन सुहृत्स्वपुर्या अहं स्वपुत्रान् समनुव्रतेन ।।४१

सोऽहं हरेर्मर्त्यविडम्बनेन दृशो नृणां चालयतो विधातुः । नान्योपलक्ष्यः पदवीं प्रसादा- च्चरामि पश्यन् गतविस्मयोऽत्र ।।४२

नूनं नृपाणां त्रिमदोत्पथानां महीं मुहुश्चालयतां चमूभिः । वधात्प्रपन्नार्तिजिहीर्षयेशो- ऽप्युपैक्षताघं भगवान् कुरूणाम् ।।४३

जिनके बाणोंके जालसे छिपकर किरातवेषधारी, अतएव किसीकी पहचानमें न आनेवाले भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये थे, वे रथी और यूथपतियोंका सुयश बढ़ानेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन तो प्रसन्न हैं न? अब तो उनके सभी शत्रु शान्त हो चुके होंगे? ।।३८।। पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिरादि जिनकी सर्वदा सँभाल रखते हैं और कुन्तीने ही जिनका लालन-पालन किया है, वे माद्रीके यमज पुत्र नकुल-सहदेव कुशलसे तो हैं न? उन्होंने युद्धमें शत्रुसे अपना राज्य उसी प्रकार छीन लिया, जैसे दो गरुड़ इन्द्रके मुखसे अमृत निकाल लायें ।।३९।। अहो! बेचारी कुन्ती तो राजर्षिश्रेष्ठ पाण्डुके वियोगमें मृतप्राय-सी होकर भी इन बालकोंके लिये ही प्राण धारण किये हुए है। रथियोंमें श्रेष्ठ

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