श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिरन्तर श्रीकृष्णके साथ रहते हुए भी उन्हें नहीं पहचाना—जिस तरह अमृतमय चन्द्रमाके समुद्रमें रहते समय मछलियाँ उन्हें नहीं पहचान सकी थीं ॥८॥ यादवलोग मनके भावको ताड़नेवाले, बड़े समझदार और भगवान्के साथ एक ही स्थानमें रहकर क्रीडा करनेवाले थे; तो भी उन सबने समस्त विश्वके आश्रय, सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्णको एक श्रेष्ठ यादव ही समझा ॥९॥ किंतु भगवान्की मायासे मोहित इन यादवों और इनसे व्यर्थका वैर ठाननेवाले शिशुपाल आदिके अवहेलना और निन्दासूचक वाक्योंसे भगवत्प्राण महानुभावोंकी बुद्धि भ्रममें नहीं पड़ती थी ॥१०॥ जिन्होंने कभी तप नहीं किया, उन लोगोंको भी इतने दिनोंतक दर्शन देकर अब उनकी दर्शन-लालसाको तृप्त किये बिना ही वे भगवान् श्रीकृष्ण अपने त्रिभुवन-मोहन श्रीविग्रहको छिपाकर अन्तर्धान हो गये हैं और इस प्रकार उन्होंने मानो उनके नेत्रोंको ही छीन लिया है ॥११॥ भगवान्ने अपनी योगमायाका प्रभाव दिखानेके लिये मानवलीलाओंके योग्य जो दिव्य श्रीविग्रह प्रकट किया था, वह इतना सुन्दर था कि उसे देखकर सारा जगत् तो मोहित हो ही जाता था, वे स्वयं भी विस्मित हो जाते थे। सौभाग्य और सुन्दरताकी पराकाष्ठा थी उस रूपमें। उससे आभूषण (अंगोंके गहने) भी विभूषित हो जाते थे ॥१२॥
धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें जब भगवान्के उस नयनाभिराम रूपपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी थी, तब त्रिलोकीने यही माना था कि मानव-सृष्टिकी रचनामें विधाताकी जितनी चतुराई है, सब इसी रूपमें पूरी हो गयी है ॥१३॥
यस्यानुरागप्लुतहासरास- लीलावलोकप्रतिलब्धमानाः । व्रजस्त्रियो दृग्भिरनुप्रवृत्त- धियोऽवतस्थुः किल कृत्यशेषाः ॥१४ स्वशान्तरूपेष्वितरैः स्वरूपै- रभ्यर्थ्यमानेष्वनुकम्पितात्मा । परावरेशो महदंशयुक्तो ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्निः ॥१५ मां खेदयत्येतदजस्य जन्म- विडम्बनं यद्वसुदेवगेहे । व्रजे च वासोऽरिभयादिव स्वयं पुराद् व्यवात्सीद्यदनन्तवीर्यः ॥१६ धुनोति चेतः स्मरतो ममैतद् यदाह पादावभिवन्द्य पित्रोः । ताताम्ब कंसादुरुशङ्कितानां प्रसीदतं नोऽकृतनिष्कृतीनाम् ॥१७ को वा अमुष्याङ्घ्रिसरोजरेणुं
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