भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कहकर फूल चढ़ा दे। इसके अनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन-पूजन (देवपूजापद्धतियोंके अनुसार) करके मध्यमें ताम्रकलश स्थापित करे। उसकी संक्षिप्त विधि यह है—‘ॐ भूरसि०’ इत्यादि मन्त्रसे भूमिकी प्रार्थना करके हाथसे (कलशके नीचेकी) भूमिका स्पर्श करे। उस समय ‘ॐ मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पितृ़तान्नौ वरीमभिः ॥’ इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये। उसी भूमिपर कुंकुम आदिसे अष्टदल कमल बनाकर उसके ऊपर ‘ॐ धान्यमसि०’ इत्यादि मन्त्रसे सप्तधान्य स्थापित करे। फिर उस सप्तधान्यपर कलश स्थापित करे; उस समय ‘ॐ आजिघ्र कलश०’ इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। इसके बाद ‘ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि०’ इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए कलशको शुद्ध जलसे भर दे। तत्पश्चात् ‘ॐ स्थिरो भव०’ इत्यादि मन्त्र पढ़कर कलशको ऐसा सुस्थिर कर दे, जिससे वह हिलने-डुलने या गिरने लायक न रह जाय। फिर उस कलशके पूर्व भागमें ‘ॐ अग्निमीळे०’ इत्यादि मन्त्रसे ऋग्वेदका, दक्षिण भागमें ‘ॐ इषे त्वोर्जेत्वा०’ इत्यादि मन्त्रसे यजुर्वेदका, पश्चिम भागमें ‘ॐ अग्न आयाहि वीतये०’ इत्यादि मन्त्रसे सामवेदका तथा ‘ॐ शन्नो देवी०’ इत्यादि मन्त्रसे उत्तर भागमें अथर्ववेदका स्थापन करे। पाँच कलश हों तो पृथक्-पृथक् कलशोंपर वेदोंकी स्थापना करनी चाहिये। इसके अनन्तर आम, बड़, पीपल, पाकर और गूलरके पल्लवोंको कलशमें डाले और ‘ॐ अश्वत्थे०’ इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ‘ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती०’ इत्यादि मन्त्रसे कलशमें दूर्वादल छोड़े, ‘ॐ पवित्रे स्थो०’ इत्यादि मन्त्रसे कुशा, ‘ॐ याः फलिनी०’ इत्यादि मन्त्रसे पूगीफल, ‘ॐ हिरण्यगर्भः०’ इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणा, ‘ॐ परिवाजपतिः०’ से पंचरत्न, ‘ॐ या ओषधीः०’ इत्यादिसे सर्वौषधी, ‘ॐ गन्धद्वारां०’ इत्यादिसे गन्ध और ‘ॐ अक्षन्नमीमदन्त०’ इत्यादिसे अक्षतको कलशमें छोड़े। तदनन्तर ‘ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०’ इत्यादिसे फूल छोड़े। ‘ॐ धूरसि०’ इत्यादिसे धूपकी आहुति अग्निमें छोड़े। ‘ॐ अग्निर्ज्योतिः०’ इत्यादि मन्त्रसे अलग दीप जलाकर रख दे। उसके बाद कलशमें तीर्थोदक डाले और ‘ॐ पञ्चनद्यः०’ इत्यादि मन्त्रको पढ़े। फिर ‘ॐ उपह्वरे०’ इत्यादि मन्त्रसे नदी-संगमका जल डाले। तत्पश्चात् ‘ॐ समुद्राय त्वा०’ इत्यादि मन्त्रसे समुद्रका जल कलशमें डाले। फिर ‘ॐ स्योना पृथिवि०’ इत्यादिसे सप्तमृत्तिका डालकर ‘ॐ वसोः पवित्रमसि०’ इत्यादि मन्त्रको पढ़ते हुए लाल वस्त्रसे कलशको आच्छादित करे। तदनन्तर ‘ॐ पूर्णादर्वि०’ इत्यादि मन्त्रसे एक पूर्णपात्र (चावलसे भरा हुआ काँसी या ताँबेका पात्र) कलशके ऊपर रखे। इसके बाद ‘ॐ श्रीश्च ते०’ इत्यादि मन्त्रसे उस पूर्णपात्रपर लाल कपड़ेमें लपेटा हुआ श्रीफल (गरीका गोला या नारियल) रखे। फिर हाथमें अक्षत ले ‘ॐ मनो जूतिः०’ इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए कलशपर अक्षत छोड़े और इस प्रकार कलशकी प्रतिष्ठा सम्पन्न करे। तदनन्तर ‘सर्वे समुद्राः सरितः०’ इत्यादि श्लोकोंका पाठ करते हुए कलशमें तीर्थोंका आवाहन करे। फिर गन्ध आदि उपचारोंसे तीर्थोंका पूजन करके