भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 432

श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णं । अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ।।१० कस्तृप्नुयात्तीर्थपदोऽभिधानात् सत्रेषु वः सूरिभिरीड्यमानात् । यः कर्णनाडीं पुरुषस्य यातो भवप्रदां गेहरतिं छिनत्ति ।।११ मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां सखापि ते भारतमाह कृष्णः । यस्मिन्नृणां ग्राम्यसुखानुवादै- र्मतिर्गृहीता नु हरेः कथायाम् ।।१२ सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः । हरेः पदानुस्मृतिनिर्वृतस्य समस्तदुःखायत्यमाशु धत्ते ।।१३ ताञ्शोच्यशोच्यानविदोऽनुशोचे हरेः कथायां विमुखानघेन । क्षिणोति देवोऽनिमिषस्तु येषा- मायुर्वृथावादगतिस्मृतीनाम् ।।१४ तदस्य कौषारव शर्मदातु- र्हरेः कथामेव कथासु सारम् । उद्धृत्य पुष्पेभ्य इवार्तबन्धो शिवाय नः कीर्तय तीर्थकीर्तेः ।।१५

हमें यह भी सुनाइये कि उन समस्त लोकपतियोंके स्वामी श्रीहरिने इन लोकों, लोकपालों और लोका-लोक-पर्वतसे बाहरके भागोंको, जिनमें ये सब प्रकारके प्राणियोंके अधिकारानुसार भिन्न-भिन्न भेद प्रतीत हो रहे हैं, किन तत्त्वोंसे रचा है ।।८।। द्विजवर! उन विश्वकर्त्ता स्वयम्भू श्रीनारायणने अपनी प्रजाके स्वभाव, कर्म, रूप और नामोंके भेदकी किस प्रकार रचना की है? भगवन्! मैंने श्रीव्यासजीके मुखसे ऊँच-नीच वर्णोंके धर्म तो कई बार सुने हैं। किन्तु अब श्रीकृष्णकथामृतके प्रवाहको छोड़कर अन्य स्वल्प-सुखदायक धर्मोंसे मेरा चित्त ऊब गया है ।।९-१०।। उन तीर्थपाद श्रीहरिके गुणानुवादसे तृप्त हो भी कौन सकता है। उनका तो नारदादि महात्मागण भी आप-जैसे साधुओंके समाजमें कीर्तन करते हैं तथा जब ये मनुष्योंके कर्णरन्ध्रोंमें प्रवेश करते हैं, तब उनकी संसारचक्रमें डालनेवाली घर-गृहस्थीकी आसक्तिको काट डालते हैं ।।११।। भगवन्! आपके सखा मुनिवर कृष्णद्वैपायनने भी

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