श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाधि आदि साधनोंसे प्राप्त होनेवाला जो परम कल्याणमय फल है, वह मेरी प्रसन्नता ही है ।।४१।। विधाता! मैं आत्माओंका भी आत्मा और स्त्री-पुत्रादि प्रियोंका भी प्रिय हूँ। देहादि भी मेरे ही लिये प्रिय हैं। अतः मुझसे ही प्रेम करना चाहिये ।।४२।। सर्ववेदमयेनेदमात्मनाऽऽत्माऽऽत्मयोनिना । प्रजाः सृज यथापूर्वं याश्च मय्यनुशेरते ।।४३
मैत्रेय उवाच
तस्मा एवं जगत्स्रष्ट्रे प्रधानपुरुषेश्वरः । व्यज्येदं स्वेन रूपेण कञ्जनाभस्तिरोदधे ।।४४
ब्रह्माजी! त्रिलोकीको तथा जो प्रजा इस समय मुझमें लीन है, उसे तुम पूर्वकल्पके समान मुझसे उत्पन्न हुए अपने सर्ववेदमय स्वरूपसे स्वयं ही रचो ।।४३।। श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—प्रकृति और पुरुषके स्वामी कमलनाभ भगवान् सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीको इस प्रकार जगत्की अभिव्यक्ति करवाकर अपने उस नारायणरूपसे अदृश्य हो गये ।।४४।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे नवमोऽध्यायः ।।९।।
१. प्रा० पा०—द्रविणदेह०। २. प्रा० पा०—पृथक्स्थितमिदं मन इन्द्रियार्थं मा०। ३. प्रा० पा०—व्यर्थातिदुःख०। ४. प्रा० पा०—तदनुग्रहाय। १. प्रा० पा०—बोधविषयाय। २. प्रा० पा०—जन्मजमलं। १. प्रा० पा०—प्रवि०। २. प्रा० पा०—जह्यां त०। ३. प्रा० पा०—गुणाश्रयैः। ४. प्रा० पा०—वरीयान्। ५. प्रा० पा०—संदर्शि०। ६. प्रा० पा०—मता।