भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 489

षोडश्युक्थौ पूर्ववक्त्रात्पुरीष्यग्निष्टुतावत । आप्तोर्यामातिरात्रौ च वाजपेयं सगोसवम् ॥४० विद्या दानं तपः सत्यं धर्मस्येति पदानि च । आश्रमांश्च यथासंख्यमसृजत्सह वृत्तिभिः ॥४१ सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत्तथा । वार्तासञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे ॥४२ वैखानसा वालखिल्याौदुम्बराः फेनपा वने । न्यासे कुटीचकः पूर्वं बह्वोदो हंसनिष्क्रियौ ॥४३

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! ब्रह्माने अपने पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तरके मुखसे क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेदोंको रचा तथा इसी क्रमसे शस्त्र (होताका कर्म), इज्या (अध्वर्युका कर्म), स्तुतिस्तोम (उद्गाताका कर्म) और प्रायश्चित्त (ब्रह्माका कर्म)—इन चारोंकी रचना की ॥३७॥ इसी प्रकार आयुर्वेद (चिकित्साशास्त्र), धनुर्वेद (शस्त्रविद्या), गान्धर्ववेद (संगीतशास्त्र) और स्थापत्यवेद (शिल्पविद्या)—इन चार उपवेदोंको भी क्रमशः उन पूर्वादि मुखोंसे ही उत्पन्न किया ॥३८॥ फिर सर्वदर्शी भगवान् ब्रह्माने अपने चारों मुखोंसे इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद बनाया ॥३९॥ इसी क्रमसे षोडशी और उक्थ, चयन और अग्निष्टोम, आप्तोर्याम और अतिरात्र तथा वाजपेय और गोसव—ये दो-दो याग भी उनके पूर्वादि मुखोंसे ही उत्पन्न हुए ॥४०॥ विद्या, दान, तप और सत्य—ये धर्मके चार पाद और वृत्तियोंके सहित चार आश्रम भी इसी क्रमसे प्रकट हुए ॥४१॥ सावित्र*, प्राजापत्य$^१$, ब्राह्म$^२$और बृहत्$^३$—ये चार वृत्तियाँ ब्रह्मचारीकी हैं तथा वार्ता$^४$, संचय$^५$, शालीन$^६$, और शिलोञ्छ$^७$—ये चार वृत्तियाँ गृहस्थकी हैं ॥४२॥ इसी प्रकार वृत्तिभेदसे वैखानस$^८$, वालखिल्य$^९$, औदुम्बर$^{१०}$और फेनप$^{११}$—ये चार भेद वानप्रस्थोंके तथा कुटीचक$^{१२}$, बहूदक$^{१३}$, हंस$^{१४}$ और निष्क्रिय (परमहंस$^{१५}$)—ये चार भेद संन्यासियोंके हैं ॥४३॥

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च । एवं व्याहृतयश्चासन् प्रणवो ह्यस्य दहतः ॥४४ तस्योष्णिगासील्लोमभ्यो गायत्री च त्वचो विभोः । त्रिष्टुम्मांसात्स्नुतोऽनुष्टुब्जगत्यस्थ्नः प्रजापतेः ॥४५ मज्जायाः पङ्क्तिरुत्पन्ना बृहती प्राणतोऽभवत् । स्पर्शस्तस्याभवज्जीवः स्वरो देह उदाहृतः ॥४६ ऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुरन्तःस्था बलमात्मनः । स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः ॥४७ शब्दब्रह्मात्मनस्तस्य व्यक्ताव्यक्तात्मनः परः ।