श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमान हो गया। अवश्य ही यज्ञमूर्ति भगवान् हमलोगोंके मनको मोहित कर रहे हैं ।।२२।। ब्रह्माजी और उनके पुत्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् यज्ञपुरुष पर्वताकार होकर गरजने लगे ।।२३।। सर्वशक्तिमान् श्रीहरिने अपनी गर्जनासे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके ब्रह्मा और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको हर्षसे भर दिया ।।२४।। अपना खेद दूर करनेवाली मायामय वराहभगवान्की घुरघुराहटको सुनकर वे जनलोक, तपलोक और सत्यलोकनिवासी मुनिगण तीनों वेदोंके परम पवित्र मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे ।।२५।। भगवान्के स्वरूपका वेदोंमें विस्तारसे वर्णन किया गया है; अतः उन मुनीश्वरोंने जो स्तुति की, उसे वेदरूप मानकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और एक बार फिर गरजकर देवताओंके हितके लिये गजराजकी-सी लीला करते हुए जलमें घुस गये ।।२६।। उत्क्षिप्तवालः खचरः कठोरः सटा विधुन्वन् खररोमशत्वक् । खुराहताभ्रः सितदंष्ट्र ईक्षा- ज्योतिर्बभासे भगवान्महीध्रः ।।२७ घ्राणेन पृथ्व्याः पदवीं विजिघ्रन् क्रोडापदेशः स्वयमध्वराङ्गः । करालदंष्ट्रोऽप्यकरालदृग्भ्या- मुद्वीक्ष्य विप्रान् गृणतोऽविशत्कम् ।।२८ स वज्रकूटाङ्गनिपातवेग- विशीर्णकुक्षिः स्तनयन्नुदन्वान् । उत्सृष्टदीर्घोर्मिभुजैरिवार्त- श्चुक्रोश यज्ञेश्वर पाहि मेति ।।२९ खुरैः क्षुरप्रैर्दरयंस्तदाऽऽप उत्पारपारं त्रिपरू रसायाम् । ददर्श गां तत्र सुषुप्सुरग्रे यां जीवधानीं स्वयमभ्यधत्त ।।३० स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं निमग्नां स उत्थितः संरुरुचे रसायाः । तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रममन्युः ।।३१ जघान रुन्धानमसह्णविक्रमं स लीलयेभं मृगराडिवाम्भसि । तद्रक्तपङ्काङ्कितगण्डतुण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ।।३२
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