श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउड़ाकर लानेवाले वायुको ही बुरा-भला कहते हैं ।।१७।। पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक- दात्यूहहंसशुकतित्तिरिबर्हिणां यः । कोलाहलो विरमतेऽचिरमात्रमुच्चै- र्भृङ्गाधिपे हरिकथामिव गायमाने ।।१८
मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकार्ण- पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः । गन्धेऽर्चिते$^१$ तुलसिकाभरणेन तस्या यस्मिंस्तपः सुमनसो बहु मानयन्ति ।।१९
यत्सङ्कुलं हरिपदानतिमात्रदृष्टै- र्वैदूर्यमारकतहेममयैर्विमानैः । येषां बृहत्कटितटाः स्मितशोभिमुख्यः कृष्णात्मनां न रज आदधुरुत्स्मयाद्यैः ।।२०
श्री रूपिणी क्वणयती चरणारविन्दं लीलाम्बुजेन हरिसद्मनि मुक्तदोषा । संलक्ष्यते स्फटिककुड्य उपेतहेम्नि सम्मार्जतीव यदनुग्रहणेऽन्ययत्नः ।।२१
वापीषु विद्रुमतटास्वमलामृताप्सु प्रेष्यान्विता निजवने तुलसीभिरीशम् । अभ्यर्चती स्वलकमुन्नसमीक्ष्य वक्त्र- मुच्छेषितं भगवतेत्यमताङ्ग यच्छ्रीः ।।२२
जिस समय भ्रमरराज ऊँचे स्वरसे गुंजार करते हुए मानो हरिकथाका गान करते हैं, उस समय थोड़ी देरके लिये कबूतर, कोयल, सारस, चकवे, पपीहे, हंस, तोते, तीतर और मोरोंका कोलाहल बंद हो जाता है—मानो वे भी उस कीर्तनानन्दमें बेसुध हो जाते हैं ।।१८।। श्रीहरि तुलसीसे अपने श्रीविग्रहको सजाते हैं और तुलसीकी गन्धका ही अधिक आदर करते हैं—यह देखकर वहाँके मन्दार, कुन्द, कुरबक (तिलकवृक्ष), उत्पल (रात्रिमें खिलनेवाले कमल), चम्पक, अर्ण, पुन्नाग, नागकेसर, बकुल (मौलसिरी), अम्बुज (दिनमें खिलनेवाले कमल) और पारिजात आदि पुष्प सुगन्धयुक्त होनेपर भी तुलसीका ही तप अधिक मानते हैं ।।१९।। वह लोक वैदूर्य, मरकत-मणि (पन्ने) और सुवर्णके विमानोंसे भरा हुआ है। ये सब किसी कर्मफलसे नहीं, बल्कि एकमात्र श्रीहरिके पादपद्मोंकी वन्दना करनेसे ही प्राप्त होते हैं। उन
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